सोम, शुक्र या शनि प्रदोष? जानें किस दिन का व्रत चमकाएगा आपकी किस्मत

हिंदू धर्म ग्रंथों और सनातन परंपरा में भगवान शिव की कृपा पाने के लिए प्रदोष व्रत को सबसे उत्तम और शीघ्र फलदायी माना गया है। हर महीने के दोनों पक्षों (कृष्ण और शुक्ल पक्ष) की त्रयोदशी तिथि को रखा जाने वाला यह पावन व्रत भोलेनाथ के भक्तों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। लेकिन बहुत से लोग इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि आखिर सोम, शुक्र या शनि प्रदोष में से किस दिन का व्रत रखना सबसे ज्यादा फलदायी होता है। ज्योतिष शास्त्र और शिव पुराण के मुताबिक, सप्ताह के अलग-अलग दिनों पर पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना एक अलग और बेहद विशेष महत्व होता है। अलग-अलग इच्छाओं और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अलग-अलग वार के प्रदोष व्रत की महिमा बताई गई है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आपके लिए किस दिन का व्रत रखना सबसे बेस्ट रहेगा और इसकी शुरुआत किस शुभ दिन से करनी चाहिए।
सोम, भौम और बुध प्रदोष व्रत का क्या है चमत्कारी महत्व
जब त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे सोम प्रदोष कहा जाता है। यह व्रत मानसिक शांति, आरोग्य और चंद्र दोष से मुक्ति के लिए बेहद अचूक माना जाता है। वहीं मंगलवार को पड़ने वाले भौम प्रदोष व्रत से कर्ज से मुक्ति मिलती है और मंगल ग्रह मजबूत होता है। बुधवार के दिन पड़ने वाले बुध प्रदोष व्रत को रखने से जातकों को ज्ञान, बुद्धि और करियर में अपार सफलता हासिल होती है। यदि आप अपने जीवन की किसी खास समस्या से परेशान हैं, तो इन दिनों के अनुसार संकल्प लेकर अपने व्रत की शुरुआत कर सकते हैं।
गुरु, शुक्र और शनि प्रदोष खोलते हैं तरक्की और सुख-समृद्धि के द्वार
गुरुवार के दिन आने वाले गुरु प्रदोष व्रत से शत्रुओं का नाश होता है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाले शुक्र प्रदोष व्रत को सुख, सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और धन-दौलत में वृद्धि के लिए सबसे उत्तम माना गया है। वहीं शनिवार के दिन आने वाले शनि प्रदोष (Shani Pradosh) की महिमा सबसे निराली है। जिन लोगों के जीवन में नौकरी या व्यापार की समस्या है या जो लोग शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से परेशान हैं, उनके लिए शनि प्रदोष का व्रत रखना भाग्य बदलने वाला साबित होता है। इससे संतान प्राप्ति की इच्छा भी पूरी होती है।
किस दिन से शुरू करना होता है सबसे शुभ, जानिए क्या है पौराणिक नियम
यदि आप पहली बार प्रदोष व्रत की शुरुआत करने जा रहे हैं, तो इसके नियमों को जानना बेहद जरूरी है। ज्योतिषविदों के अनुसार, नए व्रत की शुरुआत करने के लिए चंद्र मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला सोम प्रदोष या शनि प्रदोष सबसे ज्यादा शुभ और मंगलकारी माना जाता है। इसके अलावा आप अपनी विशेष मनोकामना के अनुसार भी संबंधित वार के प्रदोष से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, एक बार व्रत शुरू करने के बाद कम से कम 11 या 26 प्रदोष व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए और इसके बाद ही विधि-विधान से इसका उद्यापन करना चाहिए।
प्रदोष काल की पूजा विधि जिससे तुरंत प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ
इस व्रत की सबसे मुख्य बात इसकी पूजा का समय है, जिसे 'प्रदोष काल' कहा जाता है। सूर्यास्त से ठीक 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक का समय प्रदोष काल कहलाता है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। इस दौरान शिवलिंग पर कच्चे दूध, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत चढ़ाकर शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से जातक के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है।