TMC में ऐतिहासिक फूट! ममता के कालीघाट दफ्तर पर CID की रेड और अभिषेक बनर्जी पर कसता शिकंजा; जानें क्या है यह पूरा विवाद

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े और अभूतपूर्व राजनीतिक संकट से गुजर रही है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ जहां विधायकों के कथित फर्जी हस्ताक्षर (Forged Signatures) के मामले में राज्य की सीआईडी (CID) का शिकंजा उन पर कसता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ असंतोष की आवाजें तेज हो गई हैं।
इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब सीआईडी की टीमों ने कोलकाता में ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास-सह-पार्टी कार्यालय और अभिषेक बनर्जी के कामाक स्ट्रीट स्थित दफ्तर पर एक साथ छापेमारी की। यह पूरा घटनाक्रम उस समय हुआ जब ममता बनर्जी और अभिषेक दोनों विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) की बैठक के सिलसिले में दिल्ली में थे।
क्या है यह पूरा 'हस्ताक्षर जालसाजी' विवाद?
इस पूरे सियासी घमासान की जड़ में विधानसभा के भीतर विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) के चयन को लेकर हुआ एक विवाद है। दरअसल, टीएमसी के दो निष्कासित विधायकों— ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के सामने शिकायत दर्ज कराई थी कि 6 मई को हुई पार्टी की बैठक में विपक्ष के नेता के रूप में सोवनदेब चट्टोपाध्याय के चयन को लेकर कोई आधिकारिक प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ था।
शिकायत के मुख्य बिंदु:
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विधायकों का आरोप है कि विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए बैठक के प्रस्ताव पत्र और उपस्थिति पत्र (Attendance Sheet) में कई विधायकों के हस्ताक्षर पूरी तरह नकली और मनगढ़ंत (Fabricated) हैं।
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दावा किया गया है कि 70 विधायकों में से कम से कम 14 विधायकों के हस्ताक्षर सामान्य हैंडराइटिंग के बजाय 'ब्लॉक लेटर्स' (बड़े अक्षरों) में किए गए हैं, जो जालसाजी की तरफ साफ इशारा करते हैं।
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इस मामले को लेकर राज्य विधानसभा के प्रधान सचिव की शिकायत पर हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे बाद में जांच के लिए सीआईडी को सौंप दिया गया।
कालीघाट पर हाई वोल्टेज ड्रामा और CID की कार्रवाई
सीआईडी द्वारा लगातार जारी किए गए तीन समन (पूछताछ के नोटिस) पर जब अभिषेक बनर्जी पेश नहीं हुए, तो एजेंसी ने सीधे जमीनी स्तर पर सबूत जुटाने के लिए छापेमारी की रणनीति अपनाई।
जब सीआईडी की टीम भारी पुलिस बल और महिला कर्मियों के साथ हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित टीएमसी मुख्यालय पहुंची, तो वहां करीब दो घंटे तक हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। शुरुआत में परिसर की सुरक्षा में तैनात कोलकाता पुलिस के जवानों और पार्टी के कोषाध्यक्ष सुभाशीष चक्रवर्ती ने अभिषेक बनर्जी की अनुपस्थिति का हवाला देकर सीआईडी को अंदर जाने से रोक दिया। हालांकि, बाद में अतिरिक्त पुलिस बल बुलाए जाने और कानूनी सख्त हिदायत के बाद टीम भीतर दाखिल हुई।
जैसे ही इस छापेमारी की खबर फैली, टीएमसी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष और मदन मित्रा तुरंत कालीघाट आवास पहुंचे, लेकिन सीआईडी की कार्रवाई के चलते उन्हें परिसर के भीतर जाने की अनुमति नहीं मिली। हालांकि, बाद में टीएमसी ने एक जब्ती सूची (Seizure List) जारी कर दावा किया कि सीआईडी को दोनों ही दफ्तरों से कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला है और सूची पर 'निल' (Zero Seizure) लिखा गया है।
सीआईडी की 5 घंटे की पूछताछ और कल्याणी बनर्जी का गुस्सा
अभिषेक बनर्जी इस मामले में सीआईडी के सामने पेश हो चुके हैं, जहां जांच अधिकारियों ने उनसे करीब साढ़े पांच घंटे तक गहन पूछताछ की। अभिषेक बनर्जी का कहना है कि वे किसी भी जांच से पीछे नहीं हट रहे हैं और हमेशा केंद्रीय व राज्य की जांच एजेंसियों का सहयोग करते आए हैं।
लेकिन इस कानूनी लड़ाई के बीच टीएमसी का आंतरिक विवाद तब सार्वजनिक हो गया जब पार्टी के बेहद वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने खुलेआम अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
"मैं अब अभिषेक का केस नहीं लड़ूंगा…"
कल्याण बनर्जी ने एक मीडिया इंटरव्यू के दौरान अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए साफ कह दिया, "अब से मैं अभिषेक बनर्जी के किसी भी कानूनी मामले में शामिल नहीं होऊंगा। मुझे उनका अहंकार बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं राजनीति में उनसे बहुत वरिष्ठ हूं। उन्हें यह समझना चाहिए कि आज पार्टी जिस संकट का सामना कर रही है, वह उन्हीं की वजह से है।" कल्याण बनर्जी की यह नाराजगी इस बात से भी जुड़ी थी कि उन्हें आधी रात को एक टेक्स्ट मैसेज भेजकर इस केस की पैरवी से हटा दिया गया था।
आगे क्या होगा?
एक तरफ जहां टीएमसी के बागी विधायक सोमवार को इस पूरे मामले को लेकर लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) से मिलने की तैयारी में हैं, वहीं बंगाल की राजनीति में 'असली टीएमसी बनाम नकली टीएमसी' की यह जंग अब बेहद हिंसक और कानूनी मोड़ ले चुकी है। आने वाले दिन तय करेंगे कि ममता बनर्जी अपने इस बिखरते किले को कैसे संभाल पाती हैं।