उत्तर प्रदेश

सूचना विभाग की गाड़ियों से पिकनिक मनाने वाले पत्रकारों पर कसेगा शिकंजा, लागू होने जा रहे हैं ये कड़े नियम

लखनऊ (पवन सिंह) :गोया जब कमर के पीछे मसनद बिना मेहनतकशी के मुहैय्या हो जाए, तो कद्र न मसनद की यह जाती है न खुद की…!!! आए-दिन कुछ चंद मान्यता प्राप्त सहाफ़ी, बोले तो पर्चा-नवीस भाई लोग सूचना विभाग की वाहन सुविधा नोंचे रहते हैं। इन चंद मान्यता प्राप्त वाहनखोरों की वजह से अब हालात यह हो चले हैं कि जिन पत्रकारों को साल दो साल में किसी अपरिहार्य कारणवश एक-आध बार वाहन सुविधा मिल जाया करती थी, वह बंद होने की स्थिति पर आ चुकी है। सूचना विभाग से वाहन लेकर पिकनिक मनाने का ठसका अब बंद होने वाला है। विभाग अब ऐसे नियम बना रहा है जिससे "मुफ्तैय वाहन मुफ्तैय मौज" का बधियाकरण हो जाएगा।

सिर्फ जरूरी और इमरजेंसी कवरेज पर ही मिलेगी सरकारी गाड़ी

सूचना विभाग से वाहन सुविधा देने के नियमों में यह अनिवार्य होगा कि वाहन अपरिहार्य स्थितियों में किसी आकस्मिक न्यूज कवरेज पर ही मिलेगा..!! उसे इसके लिए अपने प्रतिष्ठान से लेटर देना होगा। जिन घटना/न्यूज की कवरेज के लिए वाहन की सुविधा दी जाएगी उसके वीजुवल्स/प्रकाशित न्यूज विभाग को जमा करनी होगी।

जीपीएस ट्रैकिंग से खुलेगी पोल, यूपी से बाहर गए तो कटेगा पत्ता

 विभाग में जो भी एजेंसी सूचीबद्ध होगी उसमें जीपीएस अनिवार्य होगा..जिससे पता चलता रहेगा कि वाहन उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर तो नहीं गया है…!! जीपीएस का विवरण यात्रा समाप्ति के बाद एजेंसी की जमा करना होगा तभी उसका भुगतान होगा..!!! विचार/सुझाव तो यह भी आया है कि अपरिहार्य परिस्थितियों में यह लाभ साल में एक या अधिकतम दो बार ही प्राप्त होगा..। 

पुराने किस्से: कवरेज के नाम पर 'इश्क फरमाने' का खेल

वैसे सूचना विभाग का वाहन हो और न्यूज कवरेज के कंबल के नीचे मोहब्बत का नज़राना हो तो बात ही कुछ और है.!!! कुछ साल पहले का एक वाकया है एक "फटकार" साहेब को बड़ी जोर से सूचना विभाग के फ्री के वाहन की "वाहनास" (नया शब्द) आई..!! साहब ने वाहन लिया और न्यूज कवरेज करने पहुंच गये ललितपुर…!!! उसके बाद उन्ने जो खबर खैंची गोया उस पर एक शेर पेश ए खिदमत है..

"जाता है यार सैर को गुलज़ार की तरफ़,मेरी निगाह है गुल-ए-रुख़्सार की तरफ़.."
वाहन मुफ्त का और कवरेज ईलू-ईलू हो तो ऐसी सुविधा किन्ने न भाये..??
गोया सवारी खुद की हो खुदाया तो वो बरकत कहाँ 'जो मज़ा गैरों की हरामखोरी में है।

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