विदेश

ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर ‘पैसिफिक कमांड’ किया

अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान 16 जून, 2026 को एक बड़ा निर्णय लेते हुए 'यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड' का नाम बदलकर वापस 'यूएस पैसिफिक कमांड' (USPACOM) कर दिया है। यह वही कमांड है जिसे 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हिंद महासागर और भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को देखते हुए 'इंडो-पैसिफिक' नाम दिया गया था। अब 70 साल पुरानी अपनी गौरवशाली विरासत को बहाल करने की आड़ में लिए गए इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकारों के बीच नई बहस छेड़ दी है।

2018 के ऐतिहासिक बदलाव की वापसी

वर्ष 2018 में जब यूएस पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर 'इंडो-पैसिफिक कमांड' किया गया था, तो उसे दुनिया ने एक बड़े संकेत के रूप में देखा था। यह इस बात का प्रमाण था कि अमेरिका अपनी हिंद-प्रशांत नीति में भारत को एक केंद्रीय धुरी मानता है। उस समय इसे चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना गया था। हालांकि, अब इस नाम को वापस पुरानी स्थिति में लाने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वाशिंगटन का ध्यान अब हिंद महासागर से हटकर फिर से केवल प्रशांत क्षेत्र (पैसिफिक) पर केंद्रित हो गया है।

क्या 'क्वाड' की प्राथमिकता घट रही है

इस नाम परिवर्तन ने विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों की चिंता बढ़ा दी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नाम में बदलाव महज एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी विदेश नीति में आए एक बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है। यह सवाल अब जोर-शोर से उठ रहा है कि क्या 'क्वाड' (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का गठबंधन) को ट्रंप प्रशासन अब उतनी प्राथमिकता नहीं दे रहा है? यद्यपि अमेरिका ने इस बदलाव के पीछे कोई आधिकारिक कूटनीतिक वजह स्पष्ट नहीं की है, लेकिन रक्षा जानकारों का मानना है कि इसका सीधा असर भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों पर पड़ सकता है।

भविष्य की रणनीति पर क्या असर पड़ेगा

फिलहाल, इस कदम के असर को लेकर कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध अब काफी परिपक्व हो चुके हैं। नाम बदलने का निर्णय 1947 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के समय की कमांड संरचना को वापस लाने की बात कही जा रही है, लेकिन विपक्षी दल और सुरक्षा विश्लेषक इसे अमेरिकी 'इंडो-पैसिफिक' विजन में कमी के तौर पर देख रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह केवल प्रतीकात्मक बदलाव है या फिर अमेरिका की भविष्य की विदेश नीति में भारत के महत्व को सीमित करने की एक सोची-समझी शुरुआत है।

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