धर्म

कामाख्या मंदिर के 4 सबसे बड़े रहस्य: साल में 3 दिन कपाट बंद, रजस्वला होती हैं माता, प्रसाद में मिलता है ‘खून से लाल’ वस्त्र

पूर्वोत्‍तर भारत के प्रवेश द्वार असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या देवी मंदिर (Kamakhya Temple Guwahati) सनातन धर्म के सबसे जागृत और रहस्यमयी शक्तिपीठों में से एक है। 51 शक्तिपीठों में महापीठ माने जाने वाले इस मंदिर की महिमा और इसके चमत्कारों के आगे आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह नतमस्तक नजर आता है। कामाख्या मंदिर तांत्रिक साधना का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु और अघोरी तंत्र साधना के लिए जुटते हैं। इस पवित्र मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे हैरान करने वाले और अलौकिक रहस्य हैं, जिन्हें जानकर हर कोई दंग रह जाता है। तंत्र और शक्ति के इस महातीर्थ में आस्था का एक ऐसा सैलाब उमड़ता है जो दुनिया में और कहीं देखने को नहीं मिलता।

रहस्य 1: मंदिर में नहीं है कोई मूर्ति, योनि रूप की होती है पूजा

कामाख्या देवी मंदिर का सबसे पहला और बड़ा रहस्य यह है कि इस भव्य मंदिर के गर्भगृह में माता दुर्गा या किसी अन्य देवी की कोई पारंपरिक मूर्ति स्थापित नहीं है। मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक गुफा है, जहां एक समतल चट्टान के बीच में योनि के आकार का एक प्राकृतिक विभाजन बना हुआ है। इसी योनि रूप को साक्षात माता सती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इस चट्टान के बीच से हमेशा एक प्राकृतिक झरने की तरह जल की धारा बहती रहती है। श्रद्धालु इसी पवित्र जलधारा का स्पर्श करते हैं और इसे ही माता का मुख्य चरणामृत मानकर ग्रहण करते हैं।

रहस्य 2: साल में 3 दिन बंद रहते हैं कपाट, साक्षात रजस्वला होती हैं माता

मंदिर का दूसरा और सबसे चमत्कारी रहस्य है माता का हर साल रजस्वला (Menstruation Period) होना। पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, जून के महीने में माता कामाख्या तीन दिनों के लिए मासिक धर्म के चक्र में होती हैं। इस विशेष अवधि के दौरान मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं और पुजारियों के लिए पूरी तरह से बंद कर दिए जाते हैं। इन तीन दिनों में मंदिर के भीतर किसी को भी जाने की अनुमति नहीं होती है। यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां प्रकृति के इस मानवीय और स्त्रीत्व के नियम को इतने सर्वोच्च और पवित्र स्तर पर पूजा जाता है।

रहस्य 3: ब्रह्मपुत्र नदी का पानी हो जाता है लाल, शुरू होता है अंबुबाची मेला

जब माता कामाख्या तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं, तब मंदिर के पास से बहने वाली असम की जीवनदायिनी ब्रह्मपुत्र नदी (Brahmaputra River) का पानी पूरी तरह से लाल हो जाता है। माना जाता है कि माता के गर्भगृह से निकलने वाले प्रवाह के कारण ही नदी का रंग बदलता है। इसी अलौकिक काल को 'अंबुबाची' कहा जाता है, और इस दौरान यहां विश्व प्रसिद्ध 'अंबुबाची मेला' (Ambubachi Mela) आयोजित होता है। देश-विदेश से हजारों तंत्र साधक, नागा साधु और अघोरी इस दौरान नीलांचल पर्वत पर डेरा डालते हैं और अपनी गुप्त सिद्धियों को जागृत करते हैं। चौथे दिन जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो माता के दर्शन के लिए मीलों लंबी लाइनें लगती हैं।

रहस्य 4: प्रसाद में मिलता है 'अंबुबाची वस्त्र', रक्त से सना लाल कपड़ा

कामाख्या मंदिर का चौथा सबसे बड़ा रहस्य इसका अनोखा प्रसाद है। जब तीन दिनों के बाद मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो श्रद्धालुओं को किसी मिठाई या फल के बजाय एक सूती लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इस विशेष वस्त्र को 'अंबुबाची वस्त्र' या 'अंगोदक वस्त्र' कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, कपाट बंद करने से पहले माता के योनि स्वरूप के पास सफेद रंग के सूती कपड़े रख दिए जाते हैं, और जब तीन दिन बाद कपाट खुलते हैं, तो वे कपड़े माता के रक्त से पूरी तरह लाल हो जाते हैं। भक्तों का अटूट विश्वास है कि इस लाल वस्त्र को अपने घर की तिजोरी या पूजा स्थल पर रखने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

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