मलबे का ढेर क्यों नहीं बनता जापान? हर साल 1500 भूकंप झेलने वाले देश की जादुई तकनीक

सोचिए अगर किसी देश में हर साल 1500 से ज्यादा बार धरती हिले, तो वहां का नजारा कैसा होगा? दुनिया के किसी भी दूसरे कोने में अगर इतना बड़ा प्राकृतिक संकट आ जाए, तो आलीशान शहर के शहर पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हो जाएंगे. लेकिन जापान एक ऐसा अनोखा देश है जो इस भयानक चुनौती को रोज हंसते-हंसते झेलता है और फिर भी पूरी दुनिया के सामने सीना ताने शान से खड़ा रहता है. चार सबसे खतरनाक टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन बिंदु (जंक्शन) पर बसे होने के बाद भी यहां की गगनचुंबी इमारतें ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरतीं. इसके पीछे कोई कुदरती चमत्कार नहीं है, बल्कि जापानी वैज्ञानिकों की दशकों की कड़ी रिसर्च, बेहतरीन एंटी-अर्थक्वेक इंजीनियरिंग और आपदा से लड़ने की उनकी कमाल की तैयारी है.
चार टेक्टोनिक प्लेटों का वो जानलेवा जाल, जिसने जापान को घेरा
जापान की भौगोलिक स्थिति (Geographical Location) ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है. यह देश पैसिफिक, फिलीपीन सी, यूरेशियन और नॉर्थ अमेरिकन नामक चार बड़ी और बेहद सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों के ठीक ऊपर स्थित है. ये प्लेटें जमीन के अंदर लगातार आपस में टकराती हैं और एक-दूसरे के नीचे खिसकती रहती हैं. इसी भूगर्भीय उथल-पुथल के कारण दुनिया भर में आने वाले कुल खतरनाक भूकंपों का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले जापान और उसके आसपास के समुद्री इलाकों में दर्ज किया जाता है. प्रशांत महासागर के 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) पर स्थित होना इसे दुनिया का सबसे संवेदनशील डेंजर जोन बनाता है.
भूकंप से लड़ती नहीं, बल्कि पानी की तरह हिलती हैं यहां की इमारतें
जापान ने प्रकृति से लड़ने के बजाय उसके साथ तालमेल बिठाना सीखा है. यहां के आधुनिक गगनचुंबी भवनों में 'बेस आइसोलेशन' (Base Isolation Technology) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक में इमारत की मुख्य नींव और ऊपरी ढांचे के बीच रबर, लीड और स्टील के बेहद मोटे और लचीले बेयरिंग लगाए जाते हैं. जब भी कोई तगड़ा भूकंप आता है, तो ये बेयरिंग जमीन के खतरनाक झटके को सोख (Absorb) लेते हैं, जिससे नींव तो हिलती है लेकिन ऊपरी इमारत पूरी तरह स्थिर और सुरक्षित रहती है. इसके अलावा, जिस तरह कारों में शॉक एब्जॉर्बर होते हैं, ठीक वैसे ही इमारतों में भी भारी-भरकम डैम्पर्स (Tuned Mass Dampers) लगाए जाते हैं, जो भूकंप के कंपन की ऊर्जा को हवा में ही खत्म कर देते हैं.
सख्त कानून की जिद: दुनिया के सबसे बड़े सिम्युलेटर 'E-Defense' पर टेस्ट
जापान ने अपने इतिहास में कई ऐसे जख्म झेले हैं जिन्होंने पूरे देश को तबाह कर दिया था, जैसे 1923 का 'ग्रेट कांतो भूकंप' और 1995 का 'कोबे भूकंप'. इन महा-हादसों से सीख लेकर जापान ने अपने 'बिल्डिंग कोड' (Building Safety Laws) को दुनिया में सबसे सख्त और कड़ा बना दिया है. यहां कानूनन ऐसी इमारतें बनाना अनिवार्य है जो रिक्टर स्केल पर 8 या 9 की तीव्रता वाले भीषण झटके भी बिना गिरे आसानी से झेल सकें. जापानी वैज्ञानिक 'E-Defense' नामक दुनिया के सबसे बड़े शेकिंग टेबल (भूकंप सिम्युलेटर) पर असली बहुमंजिला इमारतों का लाइव टेस्ट करते हैं ताकि निर्माण की छोटी से छोटी कमी को भी समय रहते सुधारा जा सके.
पलक झपकते ही अलर्ट: बुलेट ट्रेन में लग जाते हैं ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक
जापान के पास दुनिया का सबसे तेज और सटीक 'अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम' (EEW) है. जैसे ही जमीन के सैकड़ों किलोमीटर अंदर प्राथमिक तरंगें (P-waves) उठती हैं, देश भर में फैले सेंसर्स उन्हें मिलीसेकंड में पकड़ लेते हैं. विनाशकारी तरंगों (S-waves) के धरातल पर पहुंचने से कुछ सेकंड पहले ही पूरे देश के नागरिकों के मोबाइल पर एक खास इमरजेंसी अलार्म और अलर्ट चला जाता है. इतने कम समय में देश की बड़ी फैक्ट्रियों की मशीनें अपने आप रुक जाती हैं, बिल्डिंग्स की लिफ्ट नजदीकी सुरक्षित फ्लोर पर ठहर कर खुल जाती हैं और लोगों को संभलने का कीमती मौका मिल जाता है.
इतना ही नहीं, जापान की मशहूर 'शिंकानसेन' (Shinkansen Bullet Train) सीधे इस राष्ट्रीय भूकंप डिटेक्शन नेटवर्क से जुड़ी हुई है. जैसे ही सेंसर्स को हल्के से झटके का भी आभास होता है, 300 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रही बुलेट ट्रेनों में ऑटोमैटिक तरीके से इमरजेंसी ब्रेक एक्टिव हो जाते हैं. विनाशकारी लहरों के आने से पहले ही ट्रेनें सुरक्षित रूप से ट्रैक पर रुक जाती हैं, यही वजह है कि दशकों से इतने भूकंप आने के बावजूद जापान में आज तक कोई बड़ा बुलेट ट्रेन हादसा नहीं हुआ है.
सदियों पुरानी लकड़ी की मीनारों (Pagodas) से चुराई आधुनिक तकनीक
दिलचस्प बात यह है कि भूकंप से बचने की यह जापानी समझ सिर्फ आधुनिक विज्ञान की देन नहीं है. सदियों पुरानी लकड़ी से बनी जापानी मीनारें (Pagodas) बड़े से बड़े भूकंप में भी हमेशा सुरक्षित खड़ी रही हैं. प्राचीन इंजीनियरों ने उनके बीच में एक मुख्य और भारी लकड़ी का खंभा लगाया था, जिसे 'शिनबाशिरा' (Shinbashira) कहा जाता है. भूकंप के समय यह खंभा पूरी मीनार को एक सांप की तरह लचीलापन देता है, जिससे इमारत के अलग-अलग हिस्से विपरीत दिशाओं में हिलकर ऊर्जा को संतुलित कर लेते हैं. आज के आधुनिक जापानी इंजीनियर इसी प्राचीन कला और आर्किटेक्चर का गहराई से अध्ययन करके दुनिया की सबसे सुरक्षित गगनचुंबी इमारतें तैयार कर रहे हैं.