West Bengal OBC Reservation: पश्चिम बंगाल की नई सरकार का बड़ा फैसला, 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील ली वापस

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य में सत्ता परिवर्तन (सरकार बदलने) के बाद नई सरकार ने एक बेहद संवेदनशील मामले में अपना रुख पूरी तरह बदल लिया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य की ओबीसी (OBC) सूची में शामिल 77 समुदायों का आरक्षण दर्जा रद्द करने वाले कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी मुख्य अपील को आधिकारिक रूप से वापस ले लिया है। सोमवार को देश की शीर्ष अदालत में हुई सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस संबंध में कोर्ट को अवगत कराया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग दोनों को अपनी-अपनी याचिकाएं वापस लेने की मंजूरी दे दी है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्यों वापस ली अपनी अपील?
यह पूरा कानूनी विवाद कलकत्ता हाई कोर्ट के 22 मई 2024 के एक ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा हुआ है। उस समय हाई कोर्ट ने राज्य की ओबीसी सूची में शामिल 77 समुदायों का दर्जा पूरी तरह से निरस्त कर दिया था, जिनमें 75 मुस्लिम समुदाय शामिल थे। हाई कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और फैसले को चुनौती दी थी।
अब साल 2026 में राज्य में नई सरकार के गठन के बाद कैबिनेट ने इस रुख को पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की विशेष पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि राज्य कैबिनेट ने इस कानूनी लड़ाई को आगे न बढ़ाने और अपील वापस लेने का नीतिगत निर्णय लिया है। सरकार के इस कदम के तुरंत बाद राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी अपनी अलग से दायर याचिका को कोर्ट से वापस खींच लिया।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने क्यों रद्द किया था 77 समुदायों का OBC दर्जा?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई 2024 में दिए गए अपने फैसले में अप्रैल 2010 से सितंबर 2010 के बीच (वामपंथी सरकार के अंतिम महीनों के दौरान) ओबीसी सूची में जोड़े गए इन 77 समुदायों के आरक्षण को अवैध घोषित किया था। इसके अतिरिक्त, अदालत ने 'पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग अधिनियम, 2012' के तहत ओबीसी श्रेणी में शामिल किए गए 37 अन्य वर्गों के आरक्षण को भी पूरी तरह से निरस्त कर दिया था।
हाई कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा था कि इन समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए वैज्ञानिक डेटा के बजाय 'धर्म' (Religion) को मुख्य आधार बनाया गया था, जो कि भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और नियमों के बिल्कुल विपरीत है। अदालत ने इन समुदायों को आरक्षण के दायरे में लाने की पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक और अवैध करार दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और पिछड़ा वर्ग आयोग को याचिकाएं वापस लेने की अनुमति तो दे दी, लेकिन इसके साथ ही एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को भी स्पष्ट किया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा अपील वापस लेने का यह मतलब कतई नहीं है कि इस फैसले से प्रभावित होने वाले आम नागरिकों के रास्ते बंद हो गए हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत से उन प्रभावित पक्षों और आम लोगों की ओर से पैरवी जारी रखने की अनुमति मांगी, जिनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति इस फैसले से प्रभावित हो रही है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि कोई अन्य प्रभावित निजी पक्ष या संगठन हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखना चाहता है, तो वह अदालत में अपनी अपील को आगे बढ़ा सकता है।
गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट में आगे की अदालती कार्यवाही पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी। उस दौरान शीर्ष अदालत कुल 10 अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी। अब राज्य सरकार के पीछे हटने के बाद इस मामले का पूरा दारोमदार अन्य निजी याचिकाकर्ताओं पर टिक गया है।