विदेश

US Election Integrity: डोनाल्ड ट्रंप का चीन पर महा-धमाका, 22 करोड़ अमेरिकी वोटर्स का डेटा चुराने का लगाया आरोप

अमेरिका में आगामी नवंबर में होने वाले बेहद महत्वपूर्ण मिडटर्म इलेक्शंस (Midterm Elections) से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर चीन के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। गुरुवार 16 जुलाई 2026 को व्हाइट हाउस से दिए गए अपने एक बेहद तीखे और सनसनीखेज 25 मिनट के विशेष संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने कुछ ऐसी अत्यंत संवेदनशील और क्लासिफाइड खुफिया फाइलों को सार्वजनिक किया है, जो अमेरिकी चुनावी व्यवस्था में चीन की सीधी और अवैध दखलअंदाजी का पर्दाफाश करती हैं। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का यह नया और गंभीर दावा खुद अमेरिका की ही शीर्ष खुफिया एजेंसियों की उन पुरानी रिपोर्टों के बिल्कुल विपरीत है, जिनमें कहा गया था कि 2020 के चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

चीनी हैकर्स के निशाने पर अमेरिकी वोटर: 22 करोड़ मतदाताओं के निजी डेटा में सेंधमारी का गंभीर आरोप

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बेहद चौंकाने वाला आरोप लगाया कि उनके द्वारा डीक्लासिफाइड किए गए दस्तावेजों से साफ होता है कि चीनी खुफिया एजेंसियों और हैकर्स ने अवैध रूप से लगभग 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं की गुप्त फाइलें हासिल कर ली थीं। ट्रंप के अनुसार, इस हैक किए गए डेटाबेस में अमेरिकी नागरिकों के नाम, उनके स्थायी पते, फोन नंबर और वोटर रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली बेहद संवेदनशील जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने अमेरिकी खुफिया तंत्र (Intelligence Community) के ही कुछ अंदरूनी अधिकारियों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि इन लोगों ने चीन की इस खतरनाक साइबर साजिश की गंभीरता को जानबूझकर छिपाया और दबाया था ताकि जनता को गुमराह किया जा सके।

बीजिंग का पलटवार और ट्रेड वॉर की वापसी का खतरा: शी जिनपिंग से सुधरते रिश्ते फिर अधर में

ट्रंप के इस बेहद आक्रामक भाषण के तुरंत बाद चीन ने इन आरोपों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के आधिकारिक प्रवक्ता लियू चांग ने एक बयान जारी कर ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, "चीन ने अमेरिका के आंतरिक और राष्ट्रपति चुनावों में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही भविष्य में ऐसा करने की हमारी कोई मंशा है।" कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस कदम से दोनों महाशक्तियों के बीच हाल ही में पटरी पर लौट रहे व्यापारिक संबंध एक बार फिर पूरी तरह से पटरी से उतर सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल लंबे चले ट्रेड वॉर के बाद संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीजिंग जाकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बेहद सकारात्मक मुलाकात की थी, जिस पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है।

डेमोक्रेट्स ने ट्रंप के दावों को नकारा: खुफिया जानकारियों को 'हथियार' बनाने की दी चेतावनी

दूसरी ओर, अमेरिकी विपक्षी दल यानी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने ट्रंप के इन दावों को पूरी तरह चुनावी स्टंट और मनगढ़ंत करार दिया है। हाउस परमानेंट सेलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलिजेंस के वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सांसदों ने कार्यवाहक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक बिल पुल्टे सहित देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों एफबीआई (FBI), सीआईए (CIA) और एनएसए (NSA) के प्रमुखों को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप को नवंबर के मिडटर्म चुनावों को प्रभावित करने के लिए चुनावी सुरक्षा से जुड़े झूठे दावों और संवेदनशील खुफिया जानकारियों को एक राजनीतिक हथियार (Weaponizing Intelligence) के रूप में इस्तेमाल करने की इजाजत बिल्कुल न दी जाए। सीनेट में मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने भी ट्रंप पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि वे इन भ्रामक दावों की आड़ में आगामी नवंबर के चुनावों में अपनी पार्टी के पक्ष में हेरफेर करने की जमीन तैयार कर रहे हैं।

'सेव अमेरिका एक्ट' के जरिए चुनावी नियमों को बदलने की तैयारी: विपक्ष ने खड़े किए सवाल

जनवरी 2025 में व्हाइट हाउस में दोबारा ऐतिहासिक वापसी करने के बाद से ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार देश की चुनावी प्रक्रिया पर संघीय सरकार का केंद्रीय नियंत्रण मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं। ट्रंप इन दिनों सीनेट और कांग्रेस के रिपब्लिकन सदस्यों पर बेहद कड़े प्रावधानों वाले 'सेव अमेरिका एक्ट' (Save America Act) को जल्द से जल्द पारित करने का भारी दबाव बना रहे हैं। इस प्रस्तावित कानून के तहत वोट डालने के लिए सरकार द्वारा जारी वैध फोटो आईडी और वोटर रजिस्ट्रेशन के समय केवल अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण (Proof of Citizenship) देना अनिवार्य कर दिया जाएगा। साथ ही, सभी राज्यों को अपने वोटरों का पूरा डेटा अनिवार्य रूप से संघीय सरकार के साथ साझा करना होगा। हालांकि, डेमोक्रेट्स और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून का पुरजोर विरोध करते हुए कहा है कि अमेरिका में वोटर फ्रॉड जैसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं और इस कानून का असली मकसद गरीब और अल्पसंख्यक मतदाताओं के वैध वोटों को दबाना है।

 

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