कंगाल होने की कगार पर ड्रैगन? चीन की अर्थव्यवस्था में भारी ऐतिहासिक गिरावट, प्रॉपर्टी बाजार पूरी तरह तबाह

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय बेहद गंभीर आर्थिक संकट (Economic Crisis) के दौर से गुजर रही है। ड्रैगन की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले रियल एस्टेट सेक्टर (Property Market) में अभूतपूर्व मंदी आ चुकी है। एवरग्रैंड (Evergrande) और कंट्री गार्डन जैसी चीन की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनियां भारी कर्ज के बोझ तले दबकर दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। करोड़ों की तादाद में बिना बिके और अधूरे पड़े अपार्टमेंट्स के कारण प्रॉपर्टी की कीमतें रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई हैं। आम चीनी नागरिकों की जीवन भर की कमाई प्रॉपर्टी में फंसी होने के कारण उनका भरोसा पूरी तरह डगमगा गया है, जिससे पूरे देश में एक तरह का वित्तीय आपातकाल जैसा माहौल बन गया है।
कमजोर घरेलू मांग और फैक्ट्रियों में पसरा सन्नाटा: जीडीपी ग्रोथ हुई सुस्त
प्रॉपर्टी संकट का सीधा असर चीन की घरेलू खपत पर पड़ा है। चीनी उपभोक्ता अब पैसे खर्च करने से बच रहे हैं, जिससे देश में 'डिफ्लेशन' (Deflation) यानी मंदी की स्थिति पैदा हो गई है। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (NBS) के आंकड़ों के मुताबिक, देश की जीडीपी (GDP) ग्रोथ रेट सरकार के तय वार्षिक लक्ष्य से काफी पीछे चल रही है। रिटेल सेल्स और इंडस्ट्रियल आउटपुट के आंकड़े बेहद कमजोर आए हैं। इसके साथ ही, चीन की फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन काफी धीमा हो गया है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) द्वारा चीनी सामानों पर लगाए जा रहे भारी टैरिफ (Tariffs) के कारण चीन का एक्सपोर्ट (निर्यात) बिजनेस भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
युवाओं में रिकॉर्ड बेरोजगारी: बीजिंग की हर रणनीति हो रही फेल
आर्थिक सुस्ती का सबसे बड़ा खामियाजा चीन की युवा आबादी को भुगतना पड़ रहा है। चीन में शहरी युवाओं की बेरोजगारी दर (Youth Unemployment Rate) ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों से पास आउट होने वाले लाखों युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग की सरकार द्वारा ब्याज दरों में कटौती और बैंकों को ज्यादा लोन देने के निर्देश जैसे तमाम राहत पैकेज (Economic Stimulus) भी इस आर्थिक सुस्ती को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने भी चीन के इकोनॉमिक आउटलुक को 'स्थिर' से घटाकर 'नकारात्मक' (Negative) श्रेणी में डाल दिया है।
भारत और ग्लोबल मार्केट पर क्या होगा इसका असर?
ग्लोबल इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स के मुताबिक, चीन की इस कमजोरी का वैश्विक और खासकर भारतीय बाजारों (Indian Market) पर दोहरा असर देखने को मिल सकता है। एक तरफ जहां चीन में मंदी के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) और स्टील-एल्युमिनियम जैसी कमोडिटीज की वैश्विक मांग घटेगी, जिससे इनके दाम कम हो सकते हैं और भारत का इम्पोर्ट बिल घटेगा। वहीं दूसरी तरफ, वैश्विक कंपनियां अब चीन से अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस हटाकर भारत, वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों में शिफ्ट कर रही हैं, जिससे भारत के 'मेक इन इंडिया' (Make in India) अभियान और लोकल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स को एक बहुत बड़ा बूस्ट मिलने की उम्मीद है।