क्या जीवनभर दवाइयों पर निर्भर रहना मजबूरी है या संभव है ऑटोइम्यून बीमारियों का स्थायी इलाज? जानिए जाने-माने एक्सपर्ट्स की सीधी राय

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बिगड़ी जीवनशैली और अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण ऑटोइम्यून बीमारियों के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। ऑटोइम्यून डिसऑर्डर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) भ्रमित हो जाता है। संक्रमण या बाहरी वायरस-बैक्टीरिया से रक्षा करने के बजाय प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की ही स्वस्थ कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों को दुश्मन मानकर उन पर हमला करने लगती है। टाइप-1 डायबिटीज, रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया), सोरायसिस, लुपस और थायराइड (हाशिमोटो) जैसी बीमारियां प्रमुख ऑटोइम्यून विकारों की श्रेणी में आती हैं।
क्या हेल्थकेयर और आधुनिक चिकित्सा से पूरी तरह ठीक हो सकती हैं ये बीमारियां?
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या ऑटोइम्यून बीमारियों को सही इलाज और हेल्थकेयर से जड़ से खत्म किया जा सकता है? मेडिकल और हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में अधिकांश ऑटोइम्यून बीमारियों का पूरी तरह 'जड़ से इलाज' या 'परमानेंट क्योर' (Permanent Cure) संभव नहीं है। हालांकि, आधुनिक हेल्थकेयर थेरेपी, सही समय पर सटीक डायग्नोसिस और दवाओं की मदद से बीमारी के लक्षणों को पूरी तरह से दबाया (Remission Stage) जा सकता है। इससे मरीज बिना किसी परेशानी के एकदम सामान्य, स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकता है।
लाइफस्टाइल, गट हेल्थ और डाइट में बदलाव का जादुई असर
विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि केवल गोलियों पर निर्भर रहने के बजाय अगर मरीज अपनी गट हेल्थ (आंतों की सेहत), आहार और दिनचर्या में सुधार करे, तो ऑटोइम्यून रिस्पॉन्स काफी हद तक कम हो जाता है। एंटी-इन्फ्लेमेटरी डाइट का सेवन, प्रोसेस्ड व जंक फूड से दूरी, रोजाना योग, प्राणायाम और भरपूर नींद लेने से शरीर में सूजन (Inflammation) कम होती है। आंतों में पाए जाने वाले गुड बैक्टीरिया प्रतिरक्षा तंत्र को संतुलित करने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए प्रोबायोटिक्स और पोषक तत्वों से भरपूर खाना रिकवरी में चमत्कारिक साबित होता है।
तनाव प्रबंधन और सही समय पर एक्सपर्ट्स से सलाह बेहद जरूरी
मानसिक तनाव (Mental Stress) ऑटोइम्यून बीमारियों को भड़काने या ज्यादा गंभीर बनाने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि तनाव को दूर करने के लिए मेडिटेशन और माइंडफुलनेस को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। शरीर में असामान्य थकान, जोड़ों में लगातार दर्द, त्वचा पर रैशेज या अचानक वजन घटने-बढ़ने जैसे शुरुआती लक्षण दिखते ही बिना देरी किए विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क करें। शुरुआती दौर में बीमारी की पहचान और सही मैनेजमेंट से गंभीर जटिलताओं से आसानी से बचा जा सकता है।