Article 370: एक तरफ PoK में आटा-बिजली संकट पर गरज रही बंदूकें और सुलग रहे जनआक्रोश के गोले, तो दूसरी तरफ अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यटन और अमन का नया सवेरा!

नियंत्रण रेखा (LoC) के दोनों तरफ का नजारा आज दो पूरी तरह से भिन्न और विपरीत दुनियाओं की कहानी बयां कर रहा है। एक तरफ जहां पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बुनियादी जरूरतों, आटे, बिजली और मानवाधिकारों के लिए सड़कों पर आम जनता और सेना के बीच खूनी संघर्ष छिड़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से विकास, शांति और वैश्विक निवेश की एक अभूतपूर्व लहर देखने को मिल रही है। 5 अगस्त 2019 के ऐतिहासिक फैसले के बाद से कश्मीर घाटी ने हिंसा और बंद के पुराने दौर को पीछे छोड़कर प्रगति के एक नए युग में कदम रखा है, जिसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के पुराने एजेंडे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।
पीओके में आक्रोश की ज्वाला: महंगाई, आटा संकट और बंदूकों का खौफ
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हालात दिन-ब-दिन बेकाबू होते जा रहे हैं। मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, मीरपुर और गिलगित-बाल्टिस्तान की सड़कों पर हजारों की तादाद में नागरिक अपनी जान की परवाह किए बिना उतर चुके हैं। 'अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में हो रहे इन प्रदर्शनों का मुख्य कारण गेहूं के आटे पर मिलने वाली सब्सिडी का खत्म होना, बिजली के अनाप-शनाप बिल और पाकिस्तान सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियां हैं।
प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस की तरफ से अंधाधुंध गोलियां, आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज का सहारा लिया जा रहा है, जिससे पूरा क्षेत्र किसी युद्धक्षेत्र जैसा नजर आने लगा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस्लामाबाद सरकार पीओके के जल संसाधनों का इस्तेमाल तो अपने फायदे के लिए करती है, लेकिन वहां के निवासियों को ही महंगी बिजली और भुखमरी के मुहाने पर धकेल दिया गया है। आजादी के नाम पर वर्षों तक छले गए पीओके के लोग अब अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए पाकिस्तानी तंत्र के खिलाफ सीधी बगावत पर उतर आए हैं।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर की बदलती तस्वीर: लाल चौक से लेकर घाटियों तक अमन का नया दौर
इसके ठीक विपरीत, भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35A के निरस्त होने के बाद से सुरक्षा और सामाजिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व बदलाव आया है। कभी पत्थरबाजी, अलगाववादी हड़तालों और आतंकी सायों के लिए जानी जाने वाली श्रीनगर की ऐतिहासिक लाल चौक आज देर रात तक गुलजार रहती है।
सुरक्षा बलों के कड़े और रणनीतिक कदमों के चलते आतंकवाद की रीढ़ टूट चुकी है, और स्थानीय स्तर पर नए आतंकियों की भर्ती के आंकड़े ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। अलगाववादी नेटवर्क को मिलने वाली टेरर-फंडिंग पर करारी चोट की गई है, जिससे घाटी का आम नागरिक अब डर के बिना अपनी दिनचर्या जी पा रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और टूरिज्म का नया युग: चिनाब ब्रिज से लेकर वंदे भारत तक
विकास की इस नई कहानी का सबसे मजबूत स्तंभ यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी है। दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्च ब्रिज 'चिनाब ब्रिज' का निर्माण और उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक का पूरा होना कश्मीर को सीधे शेष भारत के रेल नेटवर्क से जोड़ चुका है। जोझिला सुरंग जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हर मौसम में लद्दाख और कश्मीर की कनेक्टिविटी सुनिश्चित कर रही हैं।
पर्यटन के क्षेत्र में कश्मीर ने नया इतिहास रचा है। पिछले वर्षों में रिकॉर्ड तोड़ करोड़ों घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों ने कश्मीर का दौरा किया है। डल झील में शिकारे की सवारी से लेकर गुलमर्ग में स्कीइंग तक, हर जगह रिसॉर्ट्स और होटल पर्यटकों से भरे रहते हैं। श्रीनगर में सफलतापूर्वक आयोजित हुई G-20 बैठक ने पूरी दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया कि कश्मीर अब एक सुरक्षित, सुंदर और वैश्विक पर्यटन गंतव्य बन चुका है।
स्थानीय युवाओं की बदलती तकदीर: पत्थरों की जगह हाथों में लैपटॉप और स्टार्टअप्स
अनुच्छेद 370 हटने का सबसे सकारात्मक प्रभाव घाटी के युवाओं पर पड़ा है। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में कभी भड़काकर पत्थर पकड़ा दिए जाते थे, आज वही युवा डिजिटल शिक्षा, खेल, सिविल सर्विसेज और स्टार्टअप्स के क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। केंद्र सरकार की विभिन्न स्वरोजगार योजनाओं, औद्योगिक नीतियों और शिक्षा सुधारों के माध्यम से युवाओं को मुख्यधारा में शामिल किया गया है।
एम्स (AIIMS) अवंतीपोरा, नए मेडिकल कॉलेज, आईआईटी और आईआईएम जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के बनने से स्थानीय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने की मजबूरी से मुक्ति मिली है। स्थानीय हस्तशिल्प, पश्मीना और केसर उद्योग को GI टैग मिलने से स्थानीय कारीगरों और किसानों की आय में भारी वृद्धि हुई है।
सीमा पार बेनकाब होता पाकिस्तान का नैरेटिव और बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य
नियंत्रण रेखा के दोनों ओर का यह नाटकीय अंतर वैश्विक समुदाय की नजरों से छिपा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर वैश्विक थिंक टैंक तक अब इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि पाकिस्तान का कश्मीर केंद्रित दुष्प्रचार अब बेअसर हो चुका है। जहां एक ओर पाकिस्तान खुद गंभीर आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और पीओके में जनता के विद्रोह से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत का कश्मीर आर्थिक विकास और सुशासन की एक मिसाल बनकर उभर रहा है।
कश्मीर के लोग अब यह भली-भांति समझ चुके हैं कि उनका वास्तविक हित और भविष्य भारत के मजबूत, लोकतांत्रिक और विकासशील ढांचे में ही सुरक्षित है। पीओके के लोग भी अब भारत के इस विकास मॉडल की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं, जिससे पाकिस्तान का नापाक नैरेटिव हमेशा के लिए बेनकाब हो गया है।