धर्म

सूर्य ग्रहण में क्यों नहीं छूनी चाहिए भगवान की मूर्ति? जानिए सूतक काल और नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा रहस्य

सनातन परंपरा में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को केवल एक खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि बड़ा आध्यात्मिक और धार्मिक बदलाव माना जाता है। ग्रहण लगने से कुछ घंटे पहले ही 'सूतक काल' शुरू हो जाता है, जिसके साथ ही घर और मंदिरों में पूजा-पाठ, आरती और देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्पर्श करने पर पूरी तरह से रोक लग जाती है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि सर्वशक्तिमान भगवान, जो पूरी सृष्टि के रचयिता हैं, उनकी मूर्ति को ग्रहण काल में छूने की मनाही क्यों होती है? इसके पीछे सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं, पौराणिक कथाएं और ऊर्जा संरक्षण से जुड़े कई रहस्य छिपे हुए हैं।

1. सूतक काल और पृथ्वी पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव

धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण की शुरुआत से ठीक 12 घंटे पहले सूतक काल लागू हो जाता है। ग्रहण के समय जब सूर्य की सीधी और सकारात्मक किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती हैं, तो वातावरण में नकारात्मक और दूषित तरंगों (Negative Vibrations) का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है। शास्त्रों में इस अवधि को 'अशुद्ध काल' माना गया है। ऐसे समय में इंसानी शरीर और आसपास का माहौल भी इस नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में रहता है, जिसके कारण मूर्तियों को स्पर्श करना वर्जित होता है।

2. प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों में दिव्य ऊर्जा की सुरक्षा

मंदिरों और घरों के पूजनीय स्थानों पर स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियां केवल पत्थर या धातु का ढांचा नहीं होतीं, बल्कि उन्हें 'प्राण-प्रतिष्ठा' के जरिए सिद्ध और जागृत किया जाता है। इन मूर्तियों में एक खास तरह का सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (Positive Energy Field) मौजूद होता है। ग्रहण काल में जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन बिगड़ता है, तो मूर्तियों के इस ऊर्जा मंडल को दूषित होने से बचाने के लिए मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और मूर्तियों को छूने की सख्त मनाही होती है।

3. राहु-केतु की पौराणिक कथा और 'अशुद्धि' की अवधारणा

पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत पान करने वाले राहु नामक दैत्य का सिर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से काट दिया था। राहु और केतु को सूर्य और चंद्र देव का शत्रु माना जाता है, जो समय-समय पर क्रोधवश सूर्य को ग्रसने की कोशिश करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में सूर्य देव संकट और कष्ट में होते हैं। ब्रह्मांडीय संकट की इस स्थिति में किसी भी प्रकार का उत्सव, पूजा-अर्चना या मूर्तियों का स्पर्श शास्त्रों के अनुसार अनुचित माना गया है।

4. मानसी पूजा और मंत्र जाप का विधान

भले ही सूर्य ग्रहण के दौरान मूर्तियों को स्पर्श करने और मूर्ति-पूजा की मनाही होती है, लेकिन इस समय ईश्वर का ध्यान और मानसिक जप करना अत्यंत शुभ और हजार गुना फलदायी माना गया है। इस दौरान लोग कपाट बंद करके दूर बैठकर 'गायत्री मंत्र', 'महामृत्युंजय मंत्र' या अपने इष्टदेव के नाम का जाप कर सकते हैं।

ग्रहण समाप्त होने के बाद कैसे करें शुद्धिकरण?

जैसे ही सूर्य ग्रहण और सूतक काल समाप्त होता है, पूरे घर और मंदिर स्थल की सफाई की जाती है। सबसे पहले गंगाजल का छिड़काव करके स्थान को पवित्र किया जाता है। इसके बाद भगवान की मूर्तियों को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और फिर विधि-विधान से आरती करके कपाट खोले जाते हैं। इसके पश्चात् दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है।

Back to top button