एजुकेशन

69000 शिक्षक भर्ती में कहाँ फँसा है कानूनी पेंच? BEd vs BTC विवाद से लेकर आरक्षण के पन्नों तक

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में बहुचर्चित 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती (69000 Shikshak Bharti) मामला एक बार फिर सुर्खियों में छाया हुआ है। साल 2019 से शुरू हुआ यह सफर आज तक कानूनी दांव-पेंच, अदालती लड़ाइयों और प्रशासनिक उलझनों के भंवर जाल में फंसा हुआ है। कभी बीएड बनाम बीटीसी (BEd vs BTC / D.El.Ed) की योग्यता का विवाद तो कभी आरक्षण के नियमों और गुणागणित (Merit Calculation) में गड़बड़ी के आरोपों ने इस भर्ती को एक कभी न खत्म होने वाली पहेली बना दिया है। आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर इस पूरी चयन प्रक्रिया में अब तक क्या-क्या हुआ है और वर्तमान में यह मामला किस मोड़ पर खड़ा है।

बीएड बनाम बीटीसी और मेरिट का पुराना विवाद

इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत 69,000 रिक्त पदों के लिए लिखित परीक्षा के साथ हुई थी, जिसके परिणाम आने के तुरंत बाद ही विवादों का दौर शुरू हो गया था। एक तरफ जहां बीटीसी और डीएलएड योग्यताधारी छात्र तय मानकों और प्राथमिक शिक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण को आधार बना रहे थे, वहीं बीएड डिग्री धारकों को भी इसमें शामिल किए जाने के बाद से दोनों पक्षों के बीच कानूनी तकरार छिड़ गई। इसके अलावा, चयन सूची में आरक्षण के नियमों के पालन और कटऑफ अंकों को लेकर छात्रों ने बड़े पैमाने पर आवाज उठाई, जिसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की चौखट पर पहुंच गया।

आरक्षण विसंगतियां और अदालती फैसलों का दौर

भर्ती प्रक्रिया के दौरान आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि नियमों के अनुसार ओबीसी (OBC) और एससी (SC) वर्ग के कोटे का सही ढंग से पालन नहीं किया गया है, जिसके चलते योग्य उम्मीदवारों को उनके हक से वंचित होना पड़ा है। इस मुद्दे पर लंबी सुनवाई के बाद अदालतों और प्रशासनिक स्तर पर कई बार सूचियों के पुनर्मूल्यांकन और नई चयन सूचियां तैयार करने के निर्देश दिए गए। कानूनी मोर्चे पर चल रही इस खींचतान के कारण चयनित शिक्षकों की नियुक्ति और उनके समायोजन की प्रक्रिया बार-बार बाधित होती रही है, जिससे हजारों अभ्यर्थी मानसिक तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजरने को मजबूर हैं।

अभ्यर्थियों का संघर्ष और आगे की राह

न्याय की आस में पिछले कई सालों से सड़कों पर धरना-प्रदर्शन और कानूनी पैरवी कर रहे इन उम्मीदवारों की निगाहें अब पूरी तरह से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के आगामी फैसलों पर टिकी हुई हैं। हर बार नई तारीख और सुनवाई के नाम पर बढ़ती तारीखें छात्रों की उम्मीदों की परीक्षा ले रही हैं। शिक्षा विभाग और सरकार के सामने भी इस जटिल कानूनी पेंच को सुलझाकर एक पारदर्शी और अंतिम समाधान निकालने की बड़ी चुनौती बनी हुई है, ताकि उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों को उनके स्थायी शिक्षक मिल सकें और वर्षों से चल रहा यह विवाद हमेशा के लिए थम सके।

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