वित्तीय संकट का असर: कर्ज के बोझ तले दबा यह राज्य घटाएगा IAS, IPS और IFS के पद, सालाना 200 करोड़ बचाने की तैयारी

भारी-भरकम कर्ज और बढ़ते प्रशासनिक खर्चों के बीच हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य की नौकरशाही पर कैंची चलाने का बड़ा और अहम फैसला किया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य में आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारियों की स्वीकृत संख्या को घटाने का निर्णय लिया है। इसके लिए केंद्र सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजा जाएगा। सरकार का तर्क है कि बड़े कैडर को बनाए रखने से राज्य के खजाने पर हर साल करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिसे कम करना अब अनिवार्य हो गया है।
एक लाख करोड़ से ज्यादा कर्ज और भारी प्रशासनिक खर्च
हिमाचल प्रदेश इस समय एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज के वित्तीय बोझ तले दबा हुआ है। राज्य सरकार लगातार ऐसे कदम उठाने की कोशिश कर रही है जिससे गैर-जरूरी खर्चों पर लगाम लगाई जा सके। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केवल अधिकारियों के वेतन ही नहीं, बल्कि उनके सपोर्ट स्टाफ, सरकारी वाहनों, आवास और अन्य सुख-सुविधाओं पर भारी-भरकम राशि खर्च होती है। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, औसतन एक वरिष्ठ अधिकारी पर सालाना 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं। ऐसे में कैडर की संख्या में कटौती करने से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की बड़ी राहत मिल सकती है।
IAS के 23 और IFS के 35 पद घटाने का प्रस्ताव
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया है कि हिमाचल में आईएएस अधिकारियों की स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है, यानी कैडर में सीधे 23 पद कम किए जाएंगे। हालांकि मुख्यमंत्री का मानना है कि प्रशासनिक ढांचे को और दुरुस्त करने के लिए इसे 100 से 110 के बीच लाया जाना चाहिए, लेकिन अधिकारियों की संभावित नाराजगी को देखते हुए फिलहाल 23 पदों की कमी का ही प्रस्ताव रखा जा रहा है। इसके साथ ही, भारतीय वन सेवा (IFS) के मौजूदा 118 पदों को घटाकर 83 करने यानी 35 पद कम करने की तैयारी है। इसके अलावा, 96 आईपीएस पदों वाले कैडर को भी छोटा किए जाने पर विचार किया जा रहा है।
'इतनी बड़ी नौकरशाही की जरूरत नहीं'
मुख्यमंत्री सुक्खू का कहना है कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य को इतने बड़े प्रशासनिक और नौकरशाही ढांचे की कोई आवश्यकता नहीं है। सरकार ऐसे समर्पित अधिकारियों को तरजीह देना चाहती है जो राज्य की कल्याणकारी योजनाओं को ईमानदारी और पूरी गंभीरता से धरातल पर उतार सकें। कई बार देखने में आया है कि कुछ अधिकारियों के पास पर्याप्त काम नहीं होता या उनकी प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं हो पाता है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार अब केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अधिकारियों को बिना किसी देरी के एनओसी (NOC) जारी कर रही है और उन्हें तुरंत रिलीव भी किया जा रहा है।
वन विभाग के ढांचे में भी होगा सुधार
राज्य सरकार केंद्र को भेजे जाने वाले इस प्रस्ताव में वन विभाग की जमीनी हकीकत का भी जिक्र कर सकती है। विभाग के उच्च स्तर पर अधिकारियों का बड़ा और भारी ढांचा है, जबकि जमीनी स्तर पर कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है, जिससे जंगलों के प्रबंधन और कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। सरकार का यह कदम वित्तीय अनुशासन की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में प्रशासनिक कार्यकुशलता और आर्थिक संतुलन दोनों को बेहतर बनाया जा सके।