हवाई किराए पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन: नियम न मानने वाली एयरलाइंस को ‘ग्राउंड’ करने की चेतावनी, केंद्र सरकार को मिला 3 हफ्ते का समय

देश भर में त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान विमानन कंपनियों द्वारा वसूले जाने वाले मनमाने हवाई किराए और अचानक की जाने वाली मूल्य वृद्धि (Surge Pricing) पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने निजी एयरलाइंस की मनमानी पर लगाम कसने में ढिलाई बरतने को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि एयरलाइंस सरकारी दिशा-निर्देशों और मूल्य नियमों का पालन नहीं करती हैं, तो उनकी उड़ानों को तुरंत रोक दिया जाए यानी उन्हें 'ग्राउंड' (Grounded) कर दिया जाए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत एयरफेयर, बैगेज चार्ज, कैंसिलेशन और रिफंड से जुड़े अंतिम नियमों को आगामी 3 सप्ताह के भीतर तैयार कर पेश करने का समय दिया है।
याचिका में मनमानी वसूली और स्वतंत्र नियामक की मांग
शीर्ष अदालत सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायण द्वारा दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पारदर्शिता लाने, यात्रियों के उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करने और टिकट दरों में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र वैधानिक नियामक (Independent Aviation Regulator) गठित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि जब तक नए नियम पूरी तरह लागू नहीं हो जाते, तब तक पुरानी व्यवस्था ही प्रभावी है, लेकिन मौजूदा तंत्र की निष्क्रियता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण विमानन कंपनियां यात्रियों का आर्थिक शोषण कर रही हैं। अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि एक ही रूट पर अलग-अलग एयरलाइंस द्वारा ₹8,000 से लेकर ₹18,000 तक का भारी विसंगतिपूर्ण किराया वसूला जा रहा है।
'अगर एयरलाइंस नियम नहीं मानतीं तो उड़ानें रोक दो': सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जब केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया कि मंत्रालय द्वारा समय-समय पर एयरलाइंस को ऑफिस मेमोरेंडम (OM) जारी किए जाते रहे हैं, तो खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि क्या इन ज्ञापनों का ज़मीनी स्तर पर कोई व्यावहारिक प्रभाव हुआ है। पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि पुराने नियमों का क्या मूल्य रह गया है और क्या वे केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह गए हैं। अदालत ने कड़े शब्दों में निर्देश दिया कि यदि निजी विमानन कंपनियां सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य और यात्री सुरक्षा नियमों की अनदेखी करती हैं, तो सरकार को कड़ा रुख अपनाना चाहिए और ऐसी एयरलाइंस को उड़ान भरने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। अदालत ने इस बात पर बल दिया कि यात्रियों के शोषण को रोकने के लिए सख्त और बाध्यकारी प्रवर्तन तंत्र का होना अनिवार्य है।
सीलबंद लिफाफे में सौंपा गया मसौदा, 3 हफ्ते में अंतिम रूप देने का भरोसा
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक ने पीठ को अवगत कराया कि भारतीय विमानन क्षेत्र को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लाए गए नए 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' के तहत नियम बनाने की प्रक्रिया को तेज कर दिया गया है। सरकार ने प्रस्तावित नियमों का मसौदा एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया और बताया कि कुछ तकनीकी व नीतिगत पहलुओं पर अंतिम दौर की चर्चाएं चल रही हैं। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार तीन सप्ताह के भीतर सभी हितधारकों के साथ परामर्श पूरा करके अंतिम अधिसूचना को अदालत के अवलोकन के लिए रिकॉर्ड पर रख देगी। शीर्ष अदालत ने सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर तय की है।
सर्ज प्राइसिंग, कैंसिलेशन और बैगेज चार्ज पर बनेगा सख्त फ्रेमवर्क
अदालत में चल रही इस कानूनी प्रक्रिया का मुख्य केंद्र बिंदु केवल बेस फेयर को नियंत्रित करना ही नहीं है, बल्कि टिकट बुकिंग के दौरान यात्रियों पर थोपे जाने वाले विभिन्न छुपे हुए शुल्कों (Ancillary Charges) को पारदर्शी बनाना भी है। नए नियमों के मसौदे में अत्यधिक सर्ज प्राइसिंग पर एक तार्किक सीमा (Fare Capping or Rationalisation), सीट चयन के नाम पर अतिरिक्त वसूली, अतिरिक्त बैगेज चार्ज, फ्लाइट कैंसिलेशन और ऑटोमैटिक रिफंड के लिए सख्त समय-सीमा तय करने पर विचार किया जा रहा है। यदि यह ढांचा वैधानिक रूप ले लेता है, तो प्राकृतिक आपदाओं, त्योहारों जैसे दिवाली, छठ पूजा या गर्मियों की छुट्टियों के दौरान हवाई टिकटों के दामों में होने वाली अचानक चार से पांच गुना बढ़ोतरी पर कानूनी रूप से अंकुश लग जाएगा।
उपभोक्ता संरक्षण और विमानन क्षेत्र की विश्वसनीयता
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते घरेलू विमानन बाजारों में से एक है, जहां मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा यात्रा के लिए उड़ानों का उपयोग कर रहा है। ऐसे में बाजार में प्रतिस्पर्धा के नाम पर अनियंत्रित मूल्य निर्धारण से आम यात्रियों के हितों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा था। सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा हस्तक्षेप न केवल नीति-निर्माताओं पर जवाबदेही तय करता है, बल्कि एयरलाइंस को भी यह स्पष्ट संदेश देता है कि मुनाफाखोरी की आड़ में उपभोक्ता अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 7 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई के बाद यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि देश के करोड़ों हवाई यात्रियों को मनमाने किराए से राहत दिलाने के लिए सरकार किस प्रकार का ठोस और प्रभावी तंत्र पेश करती है।