व्यापार

RBI Monetary Policy Warning: अगर महंगाई दर ऊंचे स्तर पर बनी रही तो फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें, MPC मेंबर ने दिए सख्त संकेत; जानिए आम आदमी की EMI पर क्या होगा असर

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के हालिया विचार-विमर्श और बयानों से देश में ब्याज दरों में जल्द कटौती की उम्मीद लगाए बैठे कर्जदारों को झटका लग सकता है। एमपीसी के एक प्रमुख सदस्य ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि देश में खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) तय लक्ष्य से ऊपर बनी रहती है या खाद्य महंगाई के कारण कीमतों में दोबारा उबाल आता है, तो केंद्रीय बैंक महंगाई को काबू में करने के लिए पॉलिसी रेपो रेट (Repo Rate) में बढ़ोतरी करने के कड़े कदम से परहेज नहीं करेगा। इस बयान के बाद वित्तीय बाजारों में यह संकेत गहरा गया है कि आरबीआई के लिए आर्थिक वृद्धि (Growth) को सहारा देने के साथ-साथ महंगाई को 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर स्थिर रखना सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है।

4% के लक्ष्य से भटकी महंगाई तो सख्त रुख अपनाएगा केंद्रीय बैंक

आरबीआई का मुख्य कानूनी अधिदेश उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई को 4 प्रतिशत (+/- 2% के टॉलरेंस बैंड) के दायरे में बनाए रखना है। एमपीसी सदस्य के अनुसार, भले ही हेडलाइन महंगाई कुछ समय के लिए 5 प्रतिशत के आसपास स्थिर दिखे, लेकिन जब तक यह टिकाऊ आधार पर 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब नहीं आती, तब तक नीतिगत ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं है। यदि मौसम की मार, भू-राजनीतिक संकट या कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल के कारण मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक अपनी 'विड्रॉल ऑफ एकॉमोडेशन' (Withdrawal of Accommodation) या तटस्थ नीति को बदलकर दरों में इजाफे का सख्त रुख अपना सकता है।

खाद्य महंगाई और अनिश्चित मॉनसून बने सबसे बड़े जोखिम

भारतीय अर्थव्यवस्था में खुदरा महंगाई को भड़काने में सबसे बड़ा हाथ खाद्य वस्तुओं की टोकरी (Food Basket) का होता है, जिसकी सीपीआई इंडेक्स में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सेदारी है:

  • सब्जियों, दालों और मसालों में उतार-चढ़ाव: जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश या अत्यधिक गर्मी के कारण दलहन, खाद्य तेल और सब्जियों की कीमतों में बार-बार आने वाला उछाल कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) को भी प्रभावित करने लगता है।

  • सप्लाई चेन और वैश्विक रुकावटें: पश्चिम एशिया और लाल सागर में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के चलते समुद्री माल ढुलाई (Freight Rates) और आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ने से विनिर्माण क्षेत्र में लागत बढ़ रही है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

  • कच्चे तेल की कीमतें: अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दामों में अचानक होने वाली तेजी भारत के आयात बिल और परिवहन लागत को सीधे तौर पर बढ़ाकर महंगाई के दबाव को हवा देती है।

लोन की EMI और आम जनता की जेब पर सीधा प्रभाव

यदि केंद्रीय बैंक आगामी नीतिगत बैठकों में रेपो रेट बढ़ाने का फैसला लेता है, तो इसका सीधा असर आम जनता, होम बायर्स और मिडिल क्लास के बजट पर पड़ेगा:

  • होम और ऑटो लोन की EMI में इजाफा: वाणिज्यिक बैंक (जैसे SBI, HDFC, ICICI आदि) अपने लोन की ब्याज दरों को सीधे आरबीआई के एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR/RLLR) से जोड़ते हैं। रेपो रेट बढ़ते ही फ्लोटिंग रेट वाले सभी होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की मासिक किस्त (EMI) या लोन की अवधि तुरंत बढ़ जाएगी।

  • नई उधारी होगी महंगी: कंपनियों और कॉरपोरेट्स के लिए बैंकों से वर्किंग कैपिटल या नया निवेश जुटाने की लागत बढ़ेगी, जिससे नई परियोजनाओं और रोजगार सृजन की रफ्तार धीमी हो सकती है।

  • बैंक एफडी पर मिलेगा लाभ: ब्याज दरें बढ़ने का एकमात्र सकारात्मक पहलू जमाकर्ताओं और वरिष्ठ नागरिकों को मिलता है, क्योंकि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बचत खातों पर ब्याज दरें बढ़ा देते हैं।

आगामी एमपीसी बैठकों का आउटलुक और विश्लेषकों की राय

आर्थिक विश्लेषकों और ब्रोकरेज हाउसेज का मानना है कि आरबीआई जल्दबाजी में कोई भी नीतिगत ढिलाई नहीं दिखाएगा। जब तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों और घरेलू कृषि उत्पादन के स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक केंद्रीय बैंक 'वेट एंड वॉच' की मुद्रा में रहेगा। यदि आने वाले महीनों में महंगाई के आंकड़े तय सीमा से बाहर जाते हैं, तभी दरों में बढ़ोतरी की वास्तविक संभावना बनेगी, अन्यथा लंबे समय तक दरों को ऊंचे स्तर (Higher for Longer) पर बनाए रखने की रणनीति जारी रहेगी।

Back to top button