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तिब्बत में नेपाल सीमा के पास फिर फटी खतरनाक झील, बालेन सरकार ने जारी किया हाई अलर्ट; चीन ने रोका राहत और बचाव कार्य

एशियाई भू-राजनीति और हिमालयी पर्यावरण से इस समय एक बहुत ही बड़ी और डराने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं पर बसे इलाकों में सनसनी फैला दी है। तिब्बत के भीतर नेपाल की सीमा से लगे बेहद संवेदनशील और ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र में एक बार फिर से हिमस्खलन और दबाव के चलते प्राकृतिक झील (Glacial Lake) के फटने की भयंकर घटना घटी है। इस अप्रत्याशित जल प्रलय के बाद से नेपाल के उत्तरी इलाकों में बहने वाली नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा है, जिससे निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की सांसें अटक गई हैं। नेपाल के काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह (बालेन सरकार और स्थानीय प्रशासन) ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए तुरंत एक हाई अलर्ट जारी कर दिया है और नदी के किनारे बसे गांवों तथा बस्तियों के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि इस गंभीर प्राकृतिक आपदा के बीच चीन के रवैये ने क्षेत्रीय सहयोग पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, क्योंकि चीनी प्रशासन ने इस सीमावर्ती क्षेत्र में किसी भी प्रकार के संयुक्त राहत और बचाव कार्य या बाहरी मदद को पूरी तरह से रोक दिया है, जिससे स्थिति और अधिक पेचीदा हो गई है।

तिब्बत की पहाड़ी झीलों का बढ़ता खतरा और पर्यावरण संकट

हिमालयी श्रृंखलाओं में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर अब बेहद खतरनाक रूपों में सामने आने लगा है। तिब्बत का यह पूरा इलाका बड़े-बड़े ग्लेशियरों और ऊंची झीलों से घिरा हुआ है, जो लगातार पिघल रहे हैं। जब अत्यधिक मात्रा में पिघला हुआ बर्फ का पानी इन प्राकृतिक झीलों में जमा हो जाता है और भौगोलिक दबाव सहन करने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तो ये झीलें किसी बड़े बांध की तरह अचानक फट जाती हैं। इस बार भी तिब्बत के भीतर कुछ ऐसा ही हुआ है, जिसके कारण हजारों क्यूसेक पानी अचानक नेपाल की तरफ बहने वाली नदियों में आ गिरा। पर्यावरणविदों और भूगर्भ वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि तिब्बत और हिमालयी बेल्ट में बुनियादी ढांचे के विकास और बढ़ते तापमान के कारण ऐसी 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) की घटनाएं भविष्य में और ज्यादा भयानक रूप ले सकती हैं, और आज की यह घटना उसी आसन्न खतरे का एक जीवंत और डरावना प्रमाण है।

बालेन सरकार और नेपाल प्रशासन की त्वरित चेतावनी

झील फटने की इस सूचना के मिलते ही नेपाल के स्थानीय और केंद्रीय प्रशासनिक तंत्र में हड़कंप मच गया। काठमांडू के लोकप्रिय और कड़े प्रशासनिक फैसलों के लिए जाने जाने वाले मेयर बालेन शाह ने इस आपदा से निपटने के लिए तुरंत आपातकालीन कदम उठाते हुए सोशल मीडिया और आधिकारिक माध्यमों से जनता के लिए चेतावनी जारी की। प्रशासन ने विशेष तौर पर सिंधुपालचौक, रसुवा और भोटेकोशी नदी बेसिन के आसपास रहने वाले नागरिकों को आगाह किया है कि वे तुरंत नदियों के किनारों को खाली कर सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर चले जाएं। नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और स्थानीय आपदा प्रबंधन समितियों को पूरी तरह से मुस्तैद कर दिया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत मोर्चा संभाला जा सके। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पानी के अचानक बहाव से किसी भी प्रकार की जनहानि न हो, क्योंकि साल के इस समय में नदी घाटियों के पास पशुओं को चराने और स्थानीय गतिविधियों में लोग शामिल रहते हैं।

चीन का असहयोग और बचाव कार्यों पर रोक

इस पूरी आपदा के दौरान सबसे बड़ा कूटनीतिक और मानवतावादी विवाद चीन के अड़ियल रवैये को लेकर खड़ा हो गया है। चूंकि झील के फटने की मूल घटना चीनी सीमा के भीतर तिब्बत के भूभाग पर हुई है, इसलिए तकनीकी रूप से राहत कार्यों, सेंसर लगाने और शुरुआती चेतावनी प्रणाली का नियंत्रण बीजिंग के पास है। लेकिन हमेशा की तरह चीनी प्रशासन ने इस मामले में न केवल पारदर्शिता बरतने से इंकार कर दिया है, बल्कि नेपाल की तरफ से आने वाली राहत और तकनीकी टीमों को भी घटनास्थल के करीब जाने से रोक दिया है। चीन ने सुरक्षा और सामरिक गोपनीयता का हवाला देते हुए बचाव कार्यों पर पाबंदी लगा दी है, जिससे नेपाल के अधिकारियों को यह अनुमान लगाने में भारी कठिनाई हो रही है कि आगे जलप्रलय का कितना बड़ा खतरा और आ सकता है। चीन का यह संदेहास्पद और मनमाना रुख सीमावर्ती देशों के बीच आपसी सहयोग और आपदा प्रबंधन के समझौतों की पोल खोल रहा है।

भारत और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों पर असर

तिब्बत और नेपाल की सीमा पर घटी इस घटना का सीधा प्रभाव भारत के भी कई हिस्सों पर पड़ सकता है, क्योंकि नेपाल से बहने वाली कई नदियां आगे चलकर बिहार और उत्तर प्रदेश की नदियों में मिलती हैं। कोसी, गंडक और घाघरा जैसी प्रमुख नदियां यदि उफान पर आती हैं, तो भारत के उत्तरी मैदानी इलाकों में भी बाढ़ का खतरा अचानक कई गुना बढ़ जाता है। भारतीय जल संसाधन मंत्रालय और आपदा प्रबंधन एजेंसियां नेपाल के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं और उपग्रहों (Satellites) के जरिए पानी के बहाव पर पैनी नजर रख रही हैं। सीमावर्ती जिलों के जिलाधिकारियों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि यदि जलस्तर अचानक बढ़ता है, तो समय रहते निचले गांवों में बचाव दल को तैनात किया जा सके। भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय रूप से यह घटना यह साबित करती है कि हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की साझा जिम्मेदारी है।

भविष्य की चुनौतियां और स्थायी समाधान की जरूरत

हिमालयी क्षेत्र में बार-बार हो रही इन प्राकृतिक आपदाओं ने सरकारों और नीति निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब तक क्षेत्रीय देश आपस में मिलकर कोई स्थायी वैज्ञानिक समाधान नहीं निकालेंगे, तब तक करोड़ों लोगों की जान जोखिम में बनी रहेगी। तिब्बत की इन ऊंचाई वाली झीलों के पास आधुनिक अर्ली-वार्निंग सिस्टम (Early Warning Systems) लगाए जाने की सख्त जरूरत है, जो पानी का स्तर बढ़ते ही तुरंत सायरन या डिजिटल सिग्नल के जरिए नीचे बसे गांवों को आगाह कर सकें। इसके अलावा, चीन को भी अपनी संकीर्ण कूटनीति छोड़कर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा और पड़ोसी देशों के साथ पर्यावरण डेटा साझा करना होगा। फिलहाल, नेपाल और भारत के सीमावर्ती इलाकों में प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है और आने वाले कुछ घंटे राहत एवं बचाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं, जिस पर हर किसी की निगाहें टिकी हुई हैं।

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