यहूदी और इतालवी समुदायों के बाद अब न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के निशाने पर आए मोहन भागवत

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैचारिक गलियारों से इस समय एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है, जिसने अमेरिका के सबसे बड़े महानगर न्यूयॉर्क से लेकर भारतीय राजनीतिक हलकों तक में हलचल मचा दी है। न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी एक बार फिर अपने बयानों और तीखे राजनीतिक रुख के चलते वैश्विक सुर्खियों के केंद्र में आ गए हैं। इस बार उनके तीखे निशाने पर कोई स्थानीय अमेरिकी राजनेता या पश्चिमी हस्ती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की हालिया अमेरिका यात्रा और वहां होने वाले कार्यक्रम हैं। अपने कड़े तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले जोहरान ममदानी इससे पहले यहूदी और इतालवी समुदायों से जुड़े मुद्दों और हस्तियों पर अपनी मुखर टिप्पणियों को लेकर चर्चा में रह चुके हैं, और अब उन्होंने सीधे तौर पर हिंदू संगठनों और आरएसएस प्रमुख के दौरे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रवासी भारतीयों, स्थानीय अमेरिकी राजनीतिक समूहों और वैचारिक संगठनों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिससे यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि इस तीखे विरोध के पीछे की गहरी राजनीतिक और सामाजिक वजहें क्या हैं।
जोहरान ममदानी का राजनीतिक रुख और पिछला इतिहास
न्यूजीलैंड में जन्मे और अपने वामपंथी तथा प्रगतिशील वैचारिक झुकाव के लिए जाने जाने वाले जोहरान ममदानी न्यूयॉर्क की राजनीति में एक बेहद प्रभावशाली और मुखर चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने अपने छोटे से राजनीतिक सफर में कई ऐसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी है, जो अक्सर स्थापित व्यवस्था या विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक समूहों के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर देते हैं। इससे पहले उन्होंने स्थानीय नीतियों और बयानों के जरिए यहूदी समुदायों की नुमाइंदगी करने वाले संगठनों तथा इतालवी मूल के समूहों के साथ तीखे वैचारिक मतभेद मोल लिए थे। उनकी राजनीतिक शैली मुख्य रूप से पहचान की राजनीति (Identity Politics) और वैचारिक ध्रुवीकरण पर आधारित मानी जाती है, जिसके तहत वे अक्सर ऐसे विषयों को चुनते हैं जो मीडिया की सुर्खियों में आसानी से आ जाएं। अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की यात्रा पर उनके द्वारा उठाई गई आपत्तियां भी इसी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा मानी जा रही हैं, जिसका उद्देश्य प्रवासी समुदायों के एक वर्ग विशेष को प्रभावित करना है।
मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा और संघ का वैचारिक विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की इस महत्वपूर्ण विदेश यात्रा का मुख्य उद्देश्य अमेरिका में बसे लाखों प्रवासियों, हिंदू स्वयंसेवकों और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ना तथा भारतीय संस्कृति, मूल्यों और दर्शन का प्रचार-प्रसार करना है। संघ लंबे समय से दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों के बीच सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता की भावना को मजबूत करने के लिए कार्य करता रहा है। अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में जहां विभिन्न नस्लों और संस्कृतियों के लोग एक साथ रहते हैं, वहां भारतीय डायस्पोरा अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजनों का आयोजन करता है। मोहन भागवत का यह दौरा संघ के वैचारिक दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर रखने और विदेशों में रहने वाले युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, जिसे दुनिया भर में रह रहे भारतीय समुदाय का भारी समर्थन भी मिल रहा है।
मेयर के विरोध के पीछे के छिपे हुए राजनीतिक मायने
सवाल यह उठता है कि आखिर एक अमेरिकी शहर के मेयर को भारत के एक सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख की यात्रा से क्या आपत्ति हो सकती है और इसके क्या निहितार्थ हैं? जानकारों का मानना है कि पश्चिमी देशों के कुछ खास राजनीतिक हलकों में दक्षिणपंथी विचारधारा या भारतीय सांस्कृतिक संगठनों के प्रति एक पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण काम करता है, जिसका फायदा स्थानीय नेता अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उठाते हैं। जोहरान ममदानी जैसे नेता अपने खास वोट बैंक को साधे रखने और वैचारिक रूप से ध्रुवीकृत बयानों के जरिए लाइमलाइट में बने रहने के लिए ऐसे मुद्दों को हवा देते हैं। वे मोहन भागवत की यात्रा को एक सांस्कृतिक संवाद के रूप में देखने के बजाय इसे राजनीतिक चश्मे से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि न्यूयॉर्क के स्थानीय चुनावों और नस्लीय समीकरणों में उन्हें इसका राजनीतिक लाभ मिल सके।
प्रवासी भारतीयों की प्रतिक्रिया और स्थानीय समुदाय का रुख
जोहरान ममदानी के इस बयान और विरोध के बाद न्यूयॉर्क और अमेरिका के अन्य हिस्सों में रह रहे प्रवासी भारतीय समुदाय में भारी नाराजगी और रोष देखने को मिल रहा है। भारतीय मूल के लोगों का कहना है कि इस प्रकार के बयान न केवल सांस्कृतिक सहिष्णुता के खिलाफ हैं, बल्कि यह अमेरिका में रहने वाले शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करने का एक प्रयास हैं। स्थानीय हिंदू संगठनों और मंदिरों से जुड़े प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि मोहन भागवत की यात्रा पूरी तरह से सांस्कृतिक और वैचारिक संवाद के लिए है, जिसका किसी भी स्थानीय अमेरिकी नीति से कोई लेना-देना नहीं है। प्रवासी समुदाय अब संगठित होकर ऐसे बयानों का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहा है और यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि अमेरिका की धरती पर किसी भी समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत या राजनीति न फैलाई जा सके।
भविष्य की राजनीति और वैश्विक कूटनीति पर इसका असर
यह पूरा विवाद इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे स्थानीय अमेरिकी राजनीति अब केवल घरेलू मुद्दों तक सीमित न रहकर वैश्विक घटनाओं और विचारों से भी तेजी से प्रभावित हो रही है। जब भी भारत से जुड़े किसी बड़े धार्मिक या वैचारिक व्यक्तित्व का दौरा पश्चिमी देशों में होता है, तो वहां की स्थानीय राजनीति में अपने समीकरण साधने वाले नेता तुरंत उस पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जोहरान ममदानी के इस रुख का न्यूयॉर्क की स्थानीय राजनीति पर क्या असर पड़ता है और क्या प्रवासी भारतीय एकजुट होकर इस वैचारिक चुनौती का राजनीतिक रूप से जवाब देते हैं या नहीं। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम एक बार फिर यह साबित करता है कि वैचारिक सरहदें अब मिट चुकी हैं और दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटना वैश्विक मंच पर एक बड़ी बहस का मुद्दा बन सकती है।