सोनम वांगचुक ने CJP संस्थापकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर क्या कहा

देश के जाने-माने शिक्षाविद और पर्यावरण एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने हाल ही में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक सदस्यों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनके राजनीति में प्रवेश को लेकर खुलकर अपनी राय रखी है। प्रखर गुप्ता के साथ एक विशेष पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान सोनम वांगचुक ने सीजेपी के संस्थापकों—सौरव दास, अभिजीत दिपके और आशुतोष रांका—के राजनीतिक भविष्य और उनकी सोच पर बेबाकी से चर्चा की। वांगचुक के इस बयान के बाद से राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नई चर्चा छिड़ गई है कि क्या युवा एक्टिविस्टों का राजनीति में आना देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक सकारात्मक बदलाव साबित हो सकता है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान इन युवा नेताओं के साथ काफी करीब से समय बिताने वाले सोनम वांगचुक ने यह स्पष्ट किया कि इन संस्थापकों को लेकर लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं और सवाल हो सकते हैं, लेकिन वास्तविकता को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षाएं रखना या राजनीति का हिस्सा बनना कोई अपराध या बुरी बात नहीं है, बशर्ते उसका उद्देश्य देश और समाज का हित हो।
संत नहीं हैं CJP के फाउंडर, राजनीति में आने की इच्छा स्वाभाविक
सोनम वांगचुक ने पॉडकास्ट के दौरान बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीजेपी के फाउंडर्स कोई आध्यात्मिक संत नहीं हैं जो इस दुनिया और मोह-माया से परे होकर केवल समाज सेवा के लिए बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के उतरे हों। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इन युवाओं को बहुत करीब से देखा और परखा, तो उन्हें इस बात का पूरा यकीन हो गया कि इन सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अवश्य हैं। हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी जोड़ा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। वांगचुक के अनुसार, हर युवा नागरिक को देश की मुख्यधारा की राजनीति में भाग लेने और अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करने का पूरा अधिकार है।
वांगचुक ने अपने पुराने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि जब वह स्टूडेंट प्रोटेस्ट और शिक्षा मंत्रालय से जुड़ी मांगों को लेकर धरने का हिस्सा बने थे, तब कई आलोचकों ने उनके सामने यह बात उठाई थी कि सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके का संबंध पहले आम आदमी पार्टी (AAP) से रह चुका है। आलोचकों का मानना था कि यह किसी छिपे हुए राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा हो सकता है, लेकिन वांगचुक ने इन आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। उनका मानना है कि अतीत में किसी राजनीतिक दल के साथ काम करना या किसी वैचारिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखना किसी भी व्यक्ति की योग्यता को कम नहीं करता है और न ही इससे वर्तमान में उठाए जा रहे सामाजिक मुद्दों की वैधता पर कोई आंच आती है।
धरने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान राजनीतिक भविष्य पर आकलन
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से हटाने की मांग को लेकर चले लंबे विरोध प्रदर्शन के दौरान सोनम वांगचुक ने इन युवाओं के साथ लगभग दो महीने तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। इस दौरान उन्होंने इन संस्थापकों की कार्यशैली, उनकी प्रतिबद्धता और उनके दूरदर्शी दृष्टिकोण को बहुत बारीकी से महसूस किया। वांगचुक का यह मानना है कि आज के दौर में जब देश की युवा पीढ़ी राजनीति से दूर भागती है या इसे गंदा मानती है, ऐसे में अगर पढ़े-लिखे और जागरूक युवा आगे आकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं रखते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भविष्य में सौरव दास, अभिजीत दिपके और आशुतोष रांका जैसे युवा नेता सक्रिय राजनीति में एक बड़ी भूमिका निभाते हुए नजर आ सकते हैं। हालांकि, वर्तमान संदर्भ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण शर्त और सलाह भी दी। वांगचुक के मुताबिक, भले ही इन युवाओं की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हों, लेकिन यह बेहद जरूरी है कि वे वर्तमान मंच का इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाने या चुनावी लाभ के लिए न होने दें। उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि अब तक इन संस्थापकों ने अपने मंच की पवित्रता और पारदर्शिता को बनाए रखा है और वे इस बात पर पूरी तरह से कायम हैं कि उनका आंदोलन किसी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल जनहित और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित रहे।
युवा नेतृत्व और भविष्य की राजनीति पर सोनम वांगचुक का दृष्टिकोण
सोनम वांगचुक का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के युवा बदलाव की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं और अपनी राजनीतिक भागीदारी की मांग कर रहे हैं। उन्होंने इंटरव्यू में यह इच्छा भी जताई कि वह व्यक्तिगत रूप से यह देखना चाहते हैं कि देश के अधिक से अधिक युवा मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों से जुड़ें या फिर जरूरत पड़ने पर अपनी खुद की नई राजनीतिक पार्टियां बनाकर देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप करें। उनका मानना है कि जब तक युवा राजनीति में नहीं आएंगे, तब तक पुरानी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाना संभव नहीं होगा।
सीजेपी संस्थापकों के संदर्भ में वांगचुक की यह टिप्पणी उन तमाम आलोचकों के लिए भी एक करारा जवाब है जो हर सामाजिक आंदोलन के पीछे किसी न किसी राजनीतिक दल का हाथ होने का दावा करके उसे दबाने की कोशिश करते हैं। एक्टिविस्ट का यह दृष्टिकोण इस बात को रेखांकित करता है कि समाज सेवा और राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि यदि दोनों को ईमानदारी और निष्ठा के साथ मिलाया जाए, तो यह राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सीजेपी के ये संस्थापक सोनम वांगचुक के इस आकलन को सही साबित करते हुए औपचारिक रूप से चुनावी राजनीति में कदम रखते हैं या नहीं, लेकिन फिलहाल इस बयान ने देश की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में युवाओं की भूमिका को फिर से ला खड़ा किया है।