अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन का बड़ा दांव, मेल-इन वोटिंग को सीमित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई आपातकालीन गुहार

अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से चुनावी नियमों और डाक मतदान (मेल-इन वोटिंग) को लेकर घमासान छिड़ गया है। नवंबर में होने वाले आगामी बेहद महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म इलेक्शन) से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। प्रशासन की तरफ से देश की सर्वोच्च अदालत में एक आपातकालीन अपील दायर की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी डाक सेवा (USPS) के माध्यम से होने वाले मतदान प्रक्रिया पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाली योजना को किसी भी तरह से लागू करवाना है। इससे पहले निचली अदालत के एक संघीय न्यायाधीश ने इन विवादास्पद प्रतिबंधों पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के पाले में जा गिरा है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में चुनाव प्रणाली, मतदान की पारदर्शिता और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर चल रही यह कानूनी लड़ाई इस समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बनी हुई है।
#निचली अदालत के फैसले को पलटने और नए नियमों को लागू करने की जोरदार कोशिश
पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब बोस्टन स्थित अमेरिकी जिला न्यायाधीश इंदिरा तलवानी ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत ट्रंप प्रशासन के नए नियमों पर लगाई गई रोक की अवधि को और अधिक आगे बढ़ा दिया। निचली अदालत के इस आदेश से ट्रंप प्रशासन की उन योजनाओं को तगड़ा झटका लगा था जिसके तहत वे चुनाव से पहले डाक मतपत्रों के वितरण को नियंत्रित करना चाहते थे। निचली अदालत द्वारा रोक बढ़ाए जाने के तुरंत बाद, ट्रंप प्रशासन के वकीलों ने रविवार को बिना एक भी दिन गंवाए सुप्रीम कोर्ट में नया आपातकालीन आवेदन दाखिल कर दिया। प्रशासन की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने सर्वोच्च न्यायालय से पुरजोर आग्रह किया है कि वे निचली अदालत के आदेश को दरकिनार करते हुए इस नियम को तत्काल प्रभाव से लागू करने की अनुमति प्रदान करें, भले ही कई अमेरिकी राज्यों ने 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों के लिए पहले ही डाक मतपत्र भेजना शुरू क्यों न कर दिया हो।
#ट्रंप प्रशासन की दलील: समय रहते नियम लागू नहीं हुए तो चुनाव में फैल सकता है भ्रम और अराजकता
सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखते हुए ट्रंप प्रशासन के प्रतिनिधियों ने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया है कि यदि नियमों को लेकर अस्पष्टता बनी रही और निचली अदालत की रोक यूं ही जारी रही, तो आगामी चुनावों के दौरान मतदाताओं के बीच भारी भ्रम और प्रशासनिक अराजकता फैलने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर का तर्क है कि जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, विभिन्न राज्य अपने स्तर पर मेल बैलेट जारी कर रहे हैं, और यदि डाक सेवा के नए सुरक्षा मानक समय पर लागू नहीं किए गए, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता दांव पर लग सकती है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एसोसिएट जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन ने ट्रंप प्रशासन के इस नए अनुरोध पर प्रतिक्रिया देने या जवाब दाखिल करने के लिए इस बुधवार तक की सख्त समय सीमा तय की है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय क्या होगा, जो अमेरिका की चुनावी दिशा और दशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
#क्या है अमेरिकी डाक सेवा (USPS) का नया और विवादास्पद नियम?
अमेरिकी डाक सेवा द्वारा लागू किया गया यह नया नियम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इसी साल मार्च के महीने में हस्ताक्षरित किए गए एक कड़े कार्यकारी आदेश (Executive Order) का सीधा परिणाम है। राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से, विशेषकर 2020 के राष्ट्रपति चुनावों के बाद से, मेल-इन वोटिंग यानी डाक द्वारा मतदान प्रणाली की खुले तौर पर आलोचना करते रहे हैं। उनका यह निरंतर दावा रहा है कि पिछले चुनावों में उनकी हार के पीछे बड़े पैमाने पर मतदाता धोखाधड़ी और मेल बैलेट का दुरुपयोग एक प्रमुख कारण रहा था। इसी कमी को दूर करने के लिए इस नए नियम के तहत यह प्रावधान किया गया है कि सभी अमेरिकी राज्यों को अनिवार्य रूप से अमेरिकी डाक सेवा (USPS) को उन सभी नागरिकों की सूची उपलब्ध करवानी होगी जो मेल द्वारा वोट डालना चाहते हैं। इसके साथ ही, सभी आउटबाउंड और रिटर्न बैलेट लिफाफों पर एक यूनिक बारकोड का होना भी पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है। यदि कोई मतपत्र इन नए मानकों का पालन नहीं करता है या फिर उस मतदाता से जुड़ा नहीं है जिसका नाम आधिकारिक सूची में दर्ज है, तो USPS को ऐसे मतपत्रों को वितरित करने से साफ इनकार करने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।
#वर्तमान में अमेरिका में कैसी है मेल-इन वोटिंग की स्थिति और राजनीतिक प्रभाव?
मौजूदा समय में संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न राज्यों में मेल-इन वोटिंग की व्यवस्था अलग-अलग रूपों में लागू है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, देश के 29 राज्य अपने मतदाताओं को बिना कोई ठोस कारण बताए मेल द्वारा मतपत्र भेजने का अनुरोध करने की पूरी छूट देते हैं, जबकि 8 राज्य तो ऐसे हैं जो पूरी तरह से केवल मेल के माध्यम से ही अपने यहां चुनाव आयोजित कराते हैं। ऐसे में, यदि ट्रंप प्रशासन के ये नए प्रतिबंध लागू होते हैं, तो यह सीधे तौर पर लाखों मतदाताओं की मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। डेमोक्रेटिक पार्टी और मानवाधिकार संगठन इस कदम को मतदाता दमन (Voter Suppression) का एक प्रयास बता रहे हैं, जबकि रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप समर्थक इसे चुनावों में पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक कदम करार दे रहे हैं। मिडटर्म चुनावों के ठीक मुहाने पर खड़े इस कानूनी और राजनीतिक संघर्ष का परिणाम अमेरिकी लोकतंत्र के भविष्य पर एक गहरी छाप छोड़ेगा, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।