सर्जरी के बाद दर्द से कराहती रही बहू और ससुराल वाले देखते रहे तमाशा! खाना तक देने से किया इनकार

हमारे समाज में आज के आधुनिक दौर में भी रूढ़िवादी सोच और मानवीय संवेदनाओं के पतन की ऐसी कई वीभत्स तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देखकर इंसानियत भी शर्मसार हो जाती है। एक ताजा और दिल को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है जहाँ एक नवविवाहिता महिला की गंभीर सर्जरी (Surgery) होने के बाद जब उसका शरीर दर्द से तड़प रहा था, तब उसके ससुराल वालों ने न केवल उसकी सुध ली बल्कि उसे वक्त पर दो वक्त का खाना तक देने से साफ इनकार कर दिया। ऑपरेशन के बाद के उस नाजुक दौर में जहाँ मरीज को अत्यधिक देखभाल, दवाइयों और पौष्टिक आहार की सख्त जरूरत होती है, वहाँ उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार बनाया गया। इस अमानवीय घटना ने एक बार फिर से इस बेहद गंभीर और चुभने वाले सवाल को जन्म दे दिया है कि क्या हमारे समाज में बहुएं केवल घर का काम करने वाली मशीनें बनकर रह गई हैं, और क्या उनके भीतर का इंसान होना ससुराल वालों के लिए कोई मायने नहीं रखता?
ऑपरेशन के बाद अस्पताल से सीधे घर लौटी बहू और शुरू हुआ प्रताड़ना का दौर
घटना की शुरुआत तब हुई जब पीड़ित बहू को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते डॉक्टरों की सलाह पर एक बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा। सर्जरी के बाद जब वह अस्पताल से डिस्चार्ज होकर अपने ससुराल लौटी, तो उसके टांके अभी पूरी तरह से सूखे भी नहीं थे और उसे डॉक्टर ने पूरी तरह से बेड रेस्ट (Bed Rest) की सख्त हिदायत दी थी। लेकिन इंसानियत और संवेदनाओं को ताक पर रख चुके ससुराल के लोगों ने बहू की इस गंभीर शारीरिक स्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। घर पहुंचते ही उससे उम्मीद की जाने लगी कि वह अपनी बीमारी और दर्द को भूलकर तुरंत रसोई संभाले और रोजमर्रा के घरेलू कामकाज में जुट जाए। जब उसने अपनी शारीरिक लाचारी और दर्द का हवाला देते हुए असमर्थता जताई, तो ससुराल वालों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने उसके साथ बेहद बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया।
दर्द से तड़पती बहू को खाना तक देने से किया क्रूर इनकार
इस अमानवीयता की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब सर्जरी के बाद दवाइयां खाने के समय उस महिला को भूखा रखा गया और घर के सदस्यों ने उसे खाना देने से साफ मना कर दिया। परिवार के लोगों का कहना था कि वह नाटक कर रही है और काम से बचने के लिए बीमारी का बहाना बना रही है, जबकि सच्चाई यह थी कि वह बिस्तर से उठने तक की स्थिति में नहीं थी। एक तरफ जहाँ डॉक्टर ने उसे समय पर हल्का और पौष्टिक भोजन खाने की सलाह दी थी, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही ससुराल वाले उसे प्रताड़ित करने के लिए भूखा रख रहे थे। इस तरह का मानसिक और शारीरिक टॉर्चर किसी भी इंसान को अंदर से तोड़ देने के लिए काफी होता है, और एक ऐसी लड़की के लिए तो यह किसी नरक से कम नहीं था जो अपने मायके से उम्मीदों का नया संसार बसाने ससुराल आई थी।
समाज की दबी हुई आवाज और बहुओं के अधिकारों पर गंभीर सवाल
यह अकेली घटना इस बात का प्रमाण है कि आज भी कई घरों में पितृसत्तात्मक सोच और संवेदनहीनता कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी है, जहाँ एक बहू को इंसान के रूप में नहीं बल्कि एक गुलाम या रोबोट समझा जाता है। जब एक महिला शादी करके किसी नए घर में प्रवेश करती है, तो वह अपने माता-पिता को छोड़कर नए रिश्तों को संवारने आती है, लेकिन बदले में उसे कई बार इस तरह का क्रूर और शोषक व्यवहार मिलता है जो उसकी अस्मिता को कुचल देता है। समाज के बुद्धिजीवियों, महिला संगठनों और हर संवेदनशील नागरिक का यह फर्ज बनता है कि वे इस तरह की अमानवीय घटनाओं के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें। यदि समय रहते इस प्रकार की घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो समाज में मानवीय मूल्यों का पूरी तरह से पतन हो जाएगा।
न्याय की गुहार और इस मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ जरूरी कदम
जब पानी सिर से ऊपर निकल गया और उस पीड़ित बहू के लिए वहां एक पल भी गुजारना असंभव हो गया, तो उसने हिम्मत जुटाकर अपने मायके वालों को इस पूरी घटना की जानकारी दी। मायके पक्ष के लोगों ने मौके पर पहुंचकर तुरंत पुलिस की मदद ली और उस बेटी को उस प्रताड़ना के घर से बाहर निकाला, जिसके बाद अब कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह मामला हम सबको यह सोचने पर मजबूर करता है कि बहुओं के प्रति हमारे समाज का यह रवैया कब बदलेगा और कब उन्हें एक इंसान के रूप में जीने का हक मिलेगा। परिवारों को यह समझना होगा कि रिश्ते प्यार, विश्वास और एक-दूसरे के सम्मान से चलते हैं, जुल्म और प्रताड़ना से नहीं।