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ट्रंप की चेतावनी दरकिनार: US Fed ने 3 साल बाद बढ़ाईं ब्याज दरें, अमेरिकी बाजारों में हड़कंप; जानिए भारत पर असर

अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार दिए गए बयानों और खुले दबाव को दरकिनार करते हुए मौद्रिक नीति में बड़ा बदलाव किया है। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) ने अपनी ताजा दो दिवसीय बैठक में बेंचमार्क ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट्स (0.25%) की बढ़ोतरी कर दी है। वर्ष 2023 के बाद यानी पिछले 3 वर्षों के लंबे अंतराल में यह पहला मौका है जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने दरों में कटौती करने के बजाय हाइक (वृद्धि) का रुख अपनाया है। इस बढ़ोतरी के साथ ही अमेरिका में नीतिगत ब्याज दरें बढ़कर 3.75% से 4.00% की सीमा में पहुंच गई हैं।

इस अप्रत्याशित नीतिगत फैसले के सामने आते ही अमेरिकी शेयर बाजारों (Wall Street) में तेज बिकवाली देखी गई, जबकि 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड उछलकर 19 साल के उच्चतम स्तर (5% के पार) पर पहुंच गई। फेड के इस आक्रामक तेवर ने वैश्विक बाजारों में वित्तीय अस्थिरता और विकास की रफ्तार धीमी होने की आशंकाओं को गहरा कर दिया है।

व्हाइट हाउस का दबाव बनाम महंगाई की आग: आखिर फेड ने क्यों उठाया यह कदम?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से ब्याज दरों को 1% या उससे नीचे लाने की पुरजोर वकालत कर रहे थे ताकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सस्ता कर्ज मिले और विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा सके। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर दरों को तुरंत घटाने की सख्त मांग भी दोहराई थी। राजनीतिक दबावों के बावजूद फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श और नीति निर्धारकों ने बढ़ती मुद्रास्फीति को काबू में करने के अपने संवैधानिक दायित्व को प्राथमिकता दी।

फेड के इस कड़े कदम के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारक जिम्मेदार रहे:

  • जिद्दी महंगाई (Sticky Inflation): अमेरिकी उपभोक्ता मुद्रास्फीति दर फेड के 2% के दीर्घकालिक लक्ष्य के मुकाबले लगातार 3.4% से 3.7% के ऊंचे दायरे में बनी हुई है। ऊर्जा कीमतों में उछाल और खाद्य उत्पादों की महंगाई घटने का नाम नहीं ले रही है।

  • टैरिफ और व्यापार नीतियां: नए टैरिफ नियमों और संरक्षणवादी व्यापार नीतियों के चलते आयातित उत्पादों की लागत बढ़ी है, जिसने सीधे तौर पर खुदरा कीमतों को ऊपर खींचने का काम किया है।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर बूम: एआई डेटा सेंटर्स, चिप्स और हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो रहे भारी पूंजीगत खर्च के कारण उद्योगों में नकदी प्रवाह तेज बना हुआ है, जिससे अर्थव्यवस्था जरूरत से ज्यादा गर्म (Overheated) हो रही थी।

फेड चेयरमैन ने स्पष्ट किया कि जब तक मुद्रास्फीति स्पष्ट रूप से 2% के लक्ष्य की ओर नहीं लौटती, तब तक दरों को घटाना अमेरिकी नागरिकों की क्रय शक्ति के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

वॉल स्ट्रीट पर हड़कंप: टेक स्टॉक्स में भारी गिरावट, डॉलर इंडेक्स मजबूत

ब्याज दरें बढ़ने और साल के अंत तक एक और संभावित बढ़ोतरी के संकेत मिलने से अमेरिकी बाजारों में निवेशकों का भरोसा डगमगा गया:

  • नैस्डैक और एसएंडपी 500 में बिकवाली: तकनीकी (Tech) और ग्रोथ स्टॉक्स महंगे कर्ज के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। दरों में बढ़ोतरी के कारण एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया और टेस्ला जैसे दिग्गज शेयरों में तेज मुनाफावसूली दर्ज की गई।

  • बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड उछाल: यूएस 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड 5.02% के पार निकल गई। जब जोखिम-मुक्त सरकारी बॉन्ड पर 5% से ज्यादा रिटर्न मिलने लगे, तो इक्विटी मार्केट से संस्थागत पूंजी निकलकर बॉन्ड मार्केट की ओर रुख करने लगती है।

  • डॉलर की चमक बढ़ी: अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) में मजबूती आई है, जिसके चलते दुनिया भर की उभरती मुद्राओं (जैसे भारतीय रुपया, यूरो और येन) पर दबाव और गहरा गया है।

होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड होंगे महंगे: अमेरिकी उपभोक्ताओं पर सीधा असर

फेडरल फंड्स रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी का तात्कालिक असर आम अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ना तय है:

  • मॉर्गेज (होम लोन) दरें: 30-वर्षीय फिक्स्ड होम लोन दरें फिर से 7% से 7.5% के स्तर को छू सकती हैं, जिससे रियल एस्टेट बाजार में मकानों की बिक्री प्रभावित होगी।

  • क्रेडिट कार्ड और ऑटो लोन: क्रेडिट कार्ड का औसत वार्षिक ब्याज (APR) 21% से ऊपर बना हुआ है, जो और महंगा होगा। इसके साथ ही ऑटो लोन की मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी, जिससे कारों और टिकाऊ उपभोक्ता सामानों की मांग में कमी आ सकती है।

भारत और उभरते बाजारों के लिए क्या हैं इस फैसले के मायने?

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इस फैसले का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी कई स्तरों पर देखने को मिलेगा:

  • विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आकर्षक होने से विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में शिफ्ट कर सकते हैं, जिससे घरेलू शेयर बाजारों (निफ्टी और सेंसेक्स) पर दबाव दिखेगा।

  • रुपये पर दबाव और आयातित महंगाई: डॉलर मजबूत होने से भारतीय रुपये में गिरावट आ सकती है, जिससे भारत के लिए कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल का आयात महंगा होगा।

  • आरबीआई (RBI) की ब्याज दरों पर रोक: भारतीय रिजर्व बैंक जो आने वाले महीनों में रेपो रेट में कटौती कर विकास को रफ्तार देने की योजना बना रहा था, उसे अब विदेशी पूंजी के पलायन और मुद्रा विनिमय दर को संभालने के लिए ब्याज दरों में कटौती का फैसला टालना पड़ सकता है।

फेडरल रिजर्व का यह फैसला साबित करता है कि केंद्रीय बैंकों के लिए राजनीतिक मांगों के मुकाबले महंगाई पर नियंत्रण और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता अधिक सर्वोपरि है। आने वाले दिनों में व्हाइट हाउस और फेड के बीच यह टकराव और तेज होने के आसार हैं।

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