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भारत पर ‘सुपर अल-नीनो’ का बड़ा खतरा: 180 से अधिक वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी, 2026-27 में भीषण गर्मी, सूखा और तबाह हो सकती है खेती

जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच भारत सहित पूरी दुनिया के सामने एक अत्यंत विनाशकारी प्राकृतिक संकट की आहट सुनाई दे रही है। देश के 180 से अधिक प्रमुख पर्यावरणविदों, मौसम विज्ञानियों और पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों ने एक संयुक्त अपील जारी करते हुए चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 और 2027 के दौरान एक अभूतपूर्व और अत्यंत शक्तिशाली 'सुपर अल-नीनो' (Super El Niño) दस्तक देने जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वैश्विक जलवायु मॉडल्स के अनुसार, प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में हो रही असामान्य वृद्धि पिछले 1,000 वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते निगरानी और सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भारत को भीषण लू (हीटवेव), गंभीर जल संकट, सूखे और पारिस्थितिकीय विनाश का सामना करना पड़ सकता है।

प्रशांत महासागर में 4 डिग्री तक बढ़ा तापमान, फरवरी 2027 तक असर रहने की आशंका

अल-नीनो मूल रूप से एक प्राकृतिक मौसमी चक्र है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक गर्म हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार स्थिति सामान्य अल-नीनो की तुलना में कई गुना अधिक विकराल है। प्रशांत क्षेत्र में तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच चुका है और आने वाले महीनों में समुद्री सतह के तापमान की विसंगति (Anomaly) 4 डिग्री सेल्सियस के पार जाने की आशंका है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) का अनुमान है कि यह सुपर अल-नीनो आने वाले महीनों में और अधिक तीव्र होगा और कम से कम फरवरी 2027 तक सक्रिय बना रहेगा। जब समुद्री सतह इतनी ज्यादा गर्म होती है, तो यह वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Walker Circulation) को पूरी तरह बिगाड़ देती है, जिसके चलते दुनिया के कुछ हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ आती है और भारत जैसे मानसून-निर्भर देशों में बारिश का चक्र तहस-नहस हो जाता है।

भारतीय कृषि, जल स्रोतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट

भारत के लिए यह चेतावनी इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि देश का मानसून पहले से ही कम वर्षा के दबाव में रहा है। वैज्ञानिकों ने रेखांकित किया है कि जब भी प्रशांत क्षेत्र में मजबूत अल-नीनो बनता है, भारत में मानसून कमजोर पड़ता है और लंबे समय तक सूखा रहता है।

  • खरीफ और रबी फसलों पर दोहरी मार: नवंबर 2026 से लेकर 2027 की गर्मियों तक अत्यधिक गर्मी और बारिश की भारी कमी से भूजल स्तर तेजी से गिरेगा। इससे धान, गेहूं, दलहन और तिलहन की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।

  • चारा संकट और पशुपालकों की परेशानी: सूखे की स्थिति में चारागाह सूखने लगेंगे, जिससे पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों के चरवाहों व पशुपालकों की आजीविका पर सीधा प्रहार होगा।

  • खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम: कृषि उत्पादन घटने से देश में खाद्यान्न संकट और आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा रहेगा।

जंगलों में भीषण आग और जैव विविधता को अपूरणीय क्षति

वैज्ञानिकों की इस अपील में सबसे ज्यादा चिंता भारत के वनों और वन्यजीवों को लेकर जताई गई है। लंबे समय तक चलने वाले सूखे और भीषण गर्मी के कारण पश्चिमी घाट, मध्य भारत और हिमालयी तराई के जंगलों में भयंकर दावानल (Wildfires) भड़कने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

जंगलों के अत्यधिक सूखने से विशालकाय वर्षावन वृक्षों (Rainforest Trees) की सामूहिक मृत्यु हो सकती है। इसके अलावा, मौसम में आए इस अप्रत्याशित बदलाव से जंगली जानवरों के प्रजनन चक्र, भोजन की उपलब्धता और व्यवहार में गंभीर बदलाव आ सकते हैं। कई पेड़-पौधों में असमय या देर से फल आने की समस्या (Phenological shifts) खड़ी होगी, जिससे संपूर्ण खाद्य श्रृंखला प्रभावित होगी।

समुद्र में मरीन हीटवेव और कोरल रीफ्स का खात्मा

सुपर अल-नीनो का कहर केवल जमीनी इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में भी तबाही मचाएगा। समुद्र का तापमान बढ़ने से हिंद महासागर और अरब सागर में 'मरीन हीटवेव' (समुद्री लू) चल सकती हैं।

इसके परिणामस्वरूप अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और मन्नार की खाड़ी में स्थित दुर्लभ प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ) में बड़े पैमाने पर ब्लीचिंग होगी और वे नष्ट हो जाएंगे। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ने से मछलियां ठंडे पानी की तलाश में गहरे समुद्र की ओर चली जाएंगी, जिससे भारत के तटीय मछुआरों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट आ जाएगा।

वैज्ञानिकों की आपातकालीन सलाह: नुकसान के बाद नहीं, पहले करें तैयारी

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (IITM) के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि भारत को इस बार आपदा आने के बाद राहत बांटने के बजाय 'पूर्व-तैयारी' (Anticipatory Action) पर ध्यान देना होगा।

वैज्ञानिकों ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि वे अभी से जलाशयों के जल प्रबंधन की रणनीति तैयार करें, किसानों को कम पानी वाली फसलों की बुवाई के लिए प्रोत्साहित करें और जंगलों में फायर-लाइन बनाने जैसे कदम उठाएं। साथ ही, देश के विभिन्न शोध संस्थानों को एक साझा नेटवर्क बनाकर भारत के हर संवेदनशील इकोसिस्टम की चौबीसों घंटे निगरानी करने की आवश्यकता है, ताकि 2026-27 के इस संभावित 'मौसम के प्रलय' से जन-धन और पर्यावरण की रक्षा की जा सके।

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