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हामिद अंसारी के ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ वाले बयान पर देश की सियासत में उबाल, बीजेपी ने कांग्रेस पर बोला तीखा हमला

भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से वैचारिक और धार्मिक राष्ट्रवाद को लेकर घमासान छिड़ गया है। देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा दिए गए 'हिंदू राष्ट्रवाद' संबंधी बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में भारी भूचाल ला दिया है। इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) पूरी तरह से आक्रामक हो गई है और उसने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ राहुल गांधी पर भी तीखा हमला बोला है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि आज की कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से 'अल्ट्रा लेफ्ट' यानी अति-वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में आ चुकी है और वह देश की मूल संस्कृति को लगातार निशाना बना रही है। इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है, जिसमें देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों का भी खुलकर जिक्र किया जा रहा है। आइए जानते हैं कि इस पूरे विवाद की शुरुआत कहां से हुई और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम या मंच से हामिद अंसारी ने देश में बढ़ती बहुसंख्यकवादी और हिंदू राष्ट्रवाद की प्रवृत्तियों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उनके इस बयान को तुरंत ही विपक्षी दलों द्वारा समर्थन मिला, लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इसे देश की सांस्कृतिक अस्मिता और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं पर सीधा प्रहार करार दिया। बीजेपी का कहना है कि इस तरह के बयान जानबूझकर देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने और एक खास वैचारिक एजेंडे के तहत दिए जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे देश में चुनावी माहौल और राजनीतिक सरगर्मी बढ़ रही है, वैसे-वैसे वैचारिक मुद्दों पर होने वाली बयानबाजी भी और अधिक तीखी होती जा रही है, जो भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगी।

बीजेपी का कड़ा पलटवार: "आज की कांग्रेस पूरी तरह बन चुकी है अल्ट्रा लेफ्ट"

हामिद अंसारी के बयान के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा। बीजेपी ने कड़े शब्दों में कहा कि कांग्रेस पार्टी अब अपनी पुरानी मध्यममार्गी और राष्ट्रीय धारा से पूरी तरह भटक चुकी है और वह 'अल्ट्रा लेफ्ट' यानी चरम वामपंथी ताकतों के हाथों की कठपुतली बन गई है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल हमेशा से भारत की सांस्कृतिक पहचान और बहुसंख्यक समाज की आस्था को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहे हैं। बीजेपी ने यह भी कहा कि देश की जनता इस तरह की तुष्टिकरण और विभाजनकारी राजनीति को भली-भांति समझती है और समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से इसका करारा जवाब देती है।

बीजेपी ने अपने इस हमले में राहुल गांधी की कार्यशैली और उनकी राजनीतिक यात्राओं के दौरान दिए जाने वाले बयानों को भी आड़े हाथों लिया। saffron party का कहना है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी लगातार देश विरोधी और राष्ट्र को विभाजित करने वाली ताकतों के साथ खड़ी नजर आती है। जब भी देश की सनातन संस्कृति या राष्ट्रवाद पर कोई हमला होता है, तो कांग्रेस के नेता या तो उसका समर्थन करते हैं या फिर मौन साध लेते हैं। बीजेपी ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है और कोई भी व्यक्ति या वैचारिक समूह इसे अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कमजोर नहीं कर सकता है। देश की जनता राष्ट्रवाद के मुद्दे पर पूरी तरह से एकजुट है और विपक्षी दलों के ऐसे बयानों से देश की एकता को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों का जिक्र कर घमासान, इतिहास के पन्नों पर छिड़ी बहस

इस पूरे राजनीतिक विवाद में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बयानों और उनकी नीतियों का जिक्र भी प्रमुखता से किया जा रहा है। बीजेपी ने कांग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जो लोग आज 'हिंदू राष्ट्रवाद' या भारतीय संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें अपने ही दल के संस्थापक और देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के ऐतिहासिक लेखों और 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' जैसी पुस्तकों को पढ़ना चाहिए। बीजेपी ने तर्क दिया कि नेहरू जी ने भी भारत की प्राचीन संस्कृति, उसकी निरंतरता और अंतर्निहित एकता को बहुत गहराई से महसूस किया था, लेकिन आज की कांग्रेस अपने ही वैचारिक इतिहास से पूरी तरह कट चुकी है और केवल सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठी है।

दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने बीजेपी के इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सत्ता पक्ष बुनियादी मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के वैचारिक विवादों को जानबूझकर हवा दे रहा है। विपक्ष का तर्क है कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अपनी बात रखने और वैचारिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, और यदि कोई विद्वान या राजनेता देश के संविधान और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर अपने विचार रखता है, तो उसे राष्ट्रद्रोह या संस्कृति का अपमान नहीं माना जाना चाहिए। संविधान की प्रस्तावना और उसके मूल्यों की रक्षा करना हर भारतीय का कर्तव्य है, और किसी भी प्रकार का बहुसंख्यकवादी दबाव लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सही नहीं है।

देश की राजनीति पर इस वैचारिक टकराव का क्या होगा दूरगामी प्रभाव?

जैसे-जैसे यह विवाद आगे बढ़ रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में 'राष्ट्रवाद' का मुद्दा एक बार फिर से केंद्र बिंदु बनने वाला है। एक तरफ जहां बीजेपी इसे अपनी हिंदुत्ववादी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को और अधिक मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है, वहीं विपक्ष इसे संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। इस तरह के वैचारिक संघर्षों से आम जनता के बीच भी राजनीतिक जागरूकता और ध्रुवीकरण दोनों में तेजी आती है। चुनाव के लिहाज से यह मुद्दा कितना असरदार साबित होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल इस बयानबाजी ने देश के राजनीतिक पटल पर एक बार फिर से गर्माहट ला दी है।

विभिन्न राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों और क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियों पर काम करना शुरू कर दिया है। हामिद अंसारी के इस बयान और उस पर हुई राजनीतिक प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि भारत में वैचारिक बहसें कितनी संवेदनशील और गहरी हैं। जब तक राजनीतिक दल जनता के असली विकास के मुद्दों से हटकर इस तरह की वैचारिक लड़ाइयों को तवज्जो देते रहेंगे, तब तक देश की मुख्य धारा की राजनीति इसी प्रकार के टकरावों के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी। देश के जागरूक नागरिक अब इन बयानों के पीछे छिपी राजनीतिक रोटियों को भली-भांति समझने लगे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

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