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Delhi SIR Supreme Court Hearing: दिल्ली में 33 लाख मतदाताओं को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा- क्या बिना सोचे-समझे मशीन से बांटे जा रहे नोटिस?

देश की राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की कवायद को लेकर उपजा विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच चुका है। दिल्ली के कुल लगभग 97.53 लाख मतदाताओं में से एक-तिहाई से अधिक यानी 33.12 लाख से ज्यादा वोटरों को संदिग्ध मानकर नोटिस थमाए जाने के तौर-तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को कड़ी फटकार लगाई है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना पर्याप्त जमीनी जांच और मानवीय सोच के लाखों नागरिकों को जिस तरह नोटिस जारी किए गए हैं, उससे प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है कि ये नोटिस पूरी तरह 'मैकेनिकल' (यांत्रिक) और 'मशीन-जनरेटेड' (एल्गोरिदम से स्वतः तैयार) हैं।

'Logical Discrepancy' पर कोर्ट के तीखे सवाल: क्या आम नागरिक को पता भी है उसकी गलती?

सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट ही नहीं किया कि किन पैमानों और एल्गोरिदम के आधार पर किसी मतदाता को 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' (तार्किक विसंगति) या 'अनमैप्ड' (2002 के पुराने रिकॉर्ड से मेल न खाना) की श्रेणी में डाला गया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से सीधे सवाल किए:

  1. अस्पष्ट नोटिस का आधार: जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने चुनाव आयोग के वकील से पूछा कि क्या नोटिस पाने वाले सामान्य नागरिक को यह स्पष्ट बताया गया है कि उसके रिकॉर्ड में वास्तव में किस प्रकार की त्रुटि है? महज 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' लिख देने से कोई व्यक्ति यह कैसे साबित करेगा कि वह सही है?

  2. फिल्टर और मानवीय जांच की कमी: पीठ ने पूछा कि क्या लाखों लोगों को नोटिस भेजने से पहले कोई अतिरिक्त जांच या सत्यापन फिल्टर नहीं लगाया जा सकता था? इस तरह थोक के भाव नोटिस भेजने से आम जनता में अनावश्यक दहशत और परेशानी फैल रही है।

  3. 91% मामलों में नाम फिर जुड़ा: याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जिन मतदाताओं ने आपत्तियां दर्ज कराईं, उनमें से लगभग 91% के नाम दोबारा सही पाए गए और जोड़े गए। इससे साबित होता है कि नोटिस जारी करने का प्राथमिक आधार ही बेहद लचर था।

दिग्गजों को भी थमा दिए गए नोटिस: आडवाणी, केजरीवाल से लेकर सीएम और विदेश मंत्री तक शामिल

इस प्रक्रिया की विसंगतियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नोटिस पाने वालों की सूची में देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे और रह चुके अति-विशिष्ट लोग भी शामिल हैं:

  • विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और उनकी पत्नी को सुनहरी बाग पते पर 'अनमैप्ड' श्रेणी के तहत नोटिस मिला।

  • दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को उनके और माता-पिता के बीच उम्र के अंतर की विसंगति का हवाला देकर नोटिस थमाया गया।

  • पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके परिवार का नाम पुराने 2002 रिकॉर्ड से मेल न खाने (Unmapped) के चलते फ्लैग किया गया।

  • पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद जैसे नाम भी इस सूची में दर्ज पाए गए।

अदालत में यह दलील दी गई कि जब तीन बार के मुख्यमंत्री, मौजूदा मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों तक को ऐसे नोटिस मिल रहे हैं, तो झुग्गी-झोपड़ियों, किराएदारों और सामान्य नागरिकों के लिए दस्तावेज जुटाकर सत्यापन केंद्रों के चक्कर काटना कितना कष्टकारी होगा।

Election Commission Defense: 'नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं'

सुप्रीम कोर्ट के सवालों पर चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा:

  • मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाना उद्देश्य: मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के अनुसार, दिल्ली में 13.79 लाख वोटर ऐसे हैं जिनका डेटा 2002 की पिछली एसआईआर से मैप नहीं हो रहा है, जबकि 19.33 लाख वोटरों के नाम, उम्र या पते में लिपिकीय विसंगतियां पाई गई हैं।

  • सीधे नाम नहीं कटेगा: आयोग ने पीठ को आश्वस्त किया कि सिर्फ नोटिस जारी होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि संबंधित मतदाता का नाम काट दिया जाएगा। जब तक मतदाता को अपनी बात रखने और दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, किसी का नाम नहीं हटाया जाएगा।

  • तारीख आगे बढ़ाने को तैयार: नोटिस निस्तारण की अंतिम समय-सीमा 29 अक्टूबर 2026 तय है। आयोग ने अदालत में कहा कि चूंकि दिल्ली में तुरंत चुनाव नहीं हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर सत्यापन की समय-सीमा आगे बढ़ाई जा सकती है।

Supreme Court Directions: ऑनलाइन वेरिफिकेशन और 2 हफ्ते में जवाब तलब

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने चुनाव आयोग को प्रक्रिया को नागरिक-हितैषी बनाने का सुझाव दिया:

  • डिजिटल और ऑनलाइन सत्यापन: कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को वॉट्सऐप, ईमेल या डेडिकेटेड ऑनलाइन पोर्टल के जरिए दस्तावेज मंगाने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे बुजुर्गों, नौकरीपेशा और गरीब तबके को ईआरओ (ERO) दफ्तरों की लंबी कतारों में न लगना पड़े।

  • बीएलओ (BLO) करें मदद: बूथ लेवल अधिकारियों को निर्देश दिए जाएं कि वे मतदाताओं के घर जाकर फॉर्म भरने और आपत्तियां दूर कराने में सक्रिय सहयोग दें।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को औपचारिक नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (Status Report) और 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के स्पष्ट मापदंडों का हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब दो हफ्ते बाद की जाएगी।

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