उत्तर प्रदेश

यमुना एक्सप्रेसवे बस अग्निकांड: ‘बस में आग लगी, लोग चिल्ला रहे थे और मैं खिड़की से कूदी’; खौफनाक मंजर से जिंदा बची युवती ने सुनाई दिल दहला देने वाली दास्तां

मथुरा/आगरा। यमुना एक्सप्रेसवे पर देर रात का सन्नाटा उस वक्त चीख-पुकार और मातम में तब्दील हो गया, जब तेज रफ्तार से दौड़ रही एक निजी डबल डेकर स्लीपर बस अचानक आग के विशाल गोले में तब्दील हो गई। सफर में गहरी नींद में सो रहे मुसाफिरों को संभलने तक का मौका नहीं मिला और चंद मिनटों में पूरी बस जलकर खाक हो गई। इस भयावह और दिल दहला देने वाले हादसे के बीच मौत के मुंह से जिंदा बचकर बाहर निकली एक युवती ने उस खौफनाक मंजर की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी बयां की है। कांपती आवाज और नम आंखों के साथ युवती ने बताया कि कैसे उसने अपनी जान बचाने के लिए अंतिम पलों में खिड़की से छलांग लगाई, लेकिन जो सह-यात्री पीछे छूट गए, वे इतने खुशकिस्मत नहीं थे और आग की भीषण लपटों से बच नहीं पाए।

हादसे की प्रत्यक्षदर्शी और घायल युवती ने अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख के दौरान उस काली रात के एक-एक पल को याद किया। युवती के अनुसार, बस जब पूरी रफ्तार से यमुना एक्सप्रेसवे के टोल प्लाजा और कट को पार करते हुए आगे बढ़ रही थी, तब अधिकांश यात्री अपनी-अपनी स्लीपर बर्थ में सो रहे थे। तभी अचानक केबिन में कुछ जलने की तीखी बदबू आई और देखते ही देखते चारों तरफ जहरीला काला धुआं भर गया। जब तक कोई कुछ समझ पाता, आगे के हिस्से से भड़की आग की तेज लपटों ने बस के मुख्य निकास द्वार (गेट) को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया था।

'हर तरफ धुआं, बंद दरवाजा और अपनों को पुकारती चीखें': जिंदा बची युवती की दर्दनाक जुबानी

हादसे से बाल-बाल बची युवती ने बताया कि बस का मुख्य दरवाजा आग की चपेट में आने और ऑटोमैटिक लॉक जाम हो जाने के कारण बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। धुआं इतना घना और दमघोंटू था कि आंखें खोलना और सांस लेना भी नामुमकिन हो गया था। पूरी बस में चीख-पुकार, रोने की आवाजें और जान बचाने की गुहार गूंज रही थी। लोग अपने परिजनों, बच्चों और सामान को बचाने की जद्दोजहद में एक-दूसरे के ऊपर गिर रहे थे।

युवती ने बताया, "मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, सिर्फ आग की तपिश महसूस हो रही थी और गले में धुआं भर रहा था। मुझे लगा कि आज जिंदगी का आखिरी दिन है। लेकिन उसी वक्त मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी स्लीपर बर्थ के पास लगी खिड़की के शीशे को पैर और पास पड़े भारी लोहे के रॉड से पूरी ताकत से तोड़ा। जैसे ही शीशा चटका, मैंने बिना सोचे-समझे चलती-रुकती बस की ऊंचाई से नीचे छलांग लगा दी। नीचे सड़क पर गिरते ही मुझे गंभीर चोटें आईं, लेकिन मैं उठकर भागी। मेरे पीछे जो लोग खिड़की तक नहीं पहुंच सके या जो आग के घेरे में फंस गए, वे इतने लकी नहीं थे। वे चाहकर भी बाहर नहीं आ सके और जिंदा जल गए। उनकी चीखें अभी भी मेरे कानों में गूंज रही हैं।"

चीख-पुकार सुनकर दौड़े राहगीर, लेकिन बेबस कर गई आग की लपटें

एक्सप्रेसवे पर पीछे से आ रहे अन्य वाहन चालकों और स्थानीय ग्रामीणों ने जब बस को धू-धू कर जलते देखा, तो उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ियां रोकीं और यात्रियों को बचाने के लिए दौड़े। राहगीरों ने पत्थरों और डंडों से बस की अन्य खिड़कियां तोड़ने की कोशिश की, जिससे युवती समेत कुछ अन्य यात्री बाहर कूदने में सफल रहे। हालांकि, आग की भीषण लपटें और केमिकल फोम व प्लास्टिक की सीटों के जलने से निकला जहरीला धुआं इतना विकराल था कि कोई भी बस के मुख्य गेट या अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सका।

सूचना मिलते ही यमुना एक्सप्रेसवे अथॉरिटी की पेट्रोलिंग टीम, स्थानीय पुलिस और दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने कड़ी मशक्कत के बाद जब तक आग पर काबू पाया, तब तक बस का केवल लोहे का ढांचा ही शेष बचा था। पुलिस ने तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू करते हुए घायल युवती और अन्य यात्रियों को नजदीकी जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया, जहां उनका उपचार जारी है।

स्लीपर बसों में इमरजेंसी एग्जिट और सुरक्षा मानकों पर फिर उठे गंभीर सवाल

यमुना एक्सप्रेसवे पर घटित इस त्रासदपूर्ण घटना ने एक बार फिर लंबी दूरी की निजी स्लीपर बसों में यात्री सुरक्षा और तकनीकी मानकों की पोल खोलकर रख दी है। परिवहन विभाग के सख्त नियमों के बावजूद अधिकांश निजी टूरिस्ट और स्लीपर बसों में सुरक्षा नियमों की खुली अनदेखी की जाती है:

  1. इमरजेंसी गेट का चोक या बंद होना: नियमों के अनुसार बस के पिछले या दाहिने हिस्से में एक चौड़ा और आसानी से खुलने वाला इमरजेंसी एग्जिट होना चाहिए। लेकिन अधिकांश बस संचालक अतिरिक्त सीटें या स्लीपर केबिन बनाने के लालच में इस इमरजेंसी दरवाजे को वेल्डिंग करवा देते हैं या वहां बर्थ बना देते हैं।

  2. हथौड़ा (ग्लास ब्रेकर) की गैरमौजूदगी: आपातकाल में खिड़कियों के शीशे तोड़ने के लिए हर विंडो पिलर पर लाल रंग का सेफ्टी हैमर लगा होना अनिवार्य है, जो अक्सर गायब रहता है।

  3. फायर एक्सटिंग्विशर की कमी: बसों में आग बुझाने वाले अग्निशामक यंत्र या तो एक्सपायर्ड होते हैं या उन्हें ऐसी जगह छुपाकर रखा जाता है जहां चालक दल के अलावा कोई पहुंच ही नहीं सकता।

  4. अवैध माल ढुलाई और शॉर्ट सर्किट: लंबी दूरी की इन बसों की डिक्की में ज्वलनशील पदार्थ, पार्सल और अत्यधिक लगेज ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। साथ ही सस्ते और घटिया वायरिंग मॉडिफिकेशंस के कारण शॉर्ट सर्किट का खतरा हमेशा बना रहता है।

पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने घटना स्थल से साक्ष्य जुटाकर आग लगने के कारणों की गहन जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि बस के इंजन या एसी कंप्रेसर में शॉर्ट सर्किट होने से यह भीषण आग भड़की होगी। प्रशासन ने बस संचालक के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या, यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ और मोटर वाहन अधिनियम की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिंदा बची युवती का यह खौफनाक बयान न केवल हादसे की भयावहता को दिखाता है, बल्कि यह सवाल भी छोड़ जाता है कि सड़कों पर दौड़ती इन 'चलता-फिरता बारूद' बनी बसों पर नकेल कब कसी जाएगी।

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