विदेश

रूसी सेना को जिताने के लिए मोर्चे पर क्यों भेजे जा रहे मध्ययुगीन राजकुमारों और संतों के पवित्र अवशेष

पूर्वी यूक्रेन के रक्तरंजित युद्धक्षेत्र में तापमान गिरने के साथ ही जब सैन्य टकराव एक और भीषण सर्दी की ओर बढ़ रहा है, मॉस्को ने अपनी युद्ध रणनीति में एक अनोखा और अप्रत्याशित अध्याय जोड़ दिया है। युद्ध के अग्रिम मोर्चों और रूसी सैन्य ठिकानों पर अब अत्याधुनिक मिसाइलों और टैंकों के साथ-साथ मध्ययुगीन रूसी शासकों तथा योद्धा संतों के सदियों पुराने पवित्र अवशेष पहुंचाए जा रहे हैं। मॉस्को के 14वीं सदी के महान राजकुमार दिमित्री डोंस्कोय के दाहिने हाथ के अवशेषों के हिस्से को विशेष सुरक्षा घेरे में रूसी नियंत्रण वाले यूक्रेनी क्षेत्रों में भ्रमण कराया जा रहा है। रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च की आधिकारिक मान्यता है कि राजकुमार डोंस्कोय ने 1380 में कुलिकोवो के ऐतिहासिक युद्ध में मंगोल-तातार सेना को धूल चटाते समय इसी हाथ से अपनी तलवार थामी थी।

मॉस्को पैट्रियार्केट के सैन्य विभाग का स्पष्ट तर्क है कि यह संत कमांडर अदृश्य रूप से अग्रिम चौकियों पर तैनात रूसी सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। सामरिक विश्लेषक इसे केवल एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक और वैचारिक उपकरण मान रहे हैं, जिसे विशेषज्ञों ने 'मोबिलाइजिंग मिथ' यानी लामबंदी के लिए गढ़ी गई गाथा का नाम दिया है। जब किसी आधुनिक युद्ध की जटिलताएं और हताहतों की संख्या बढ़ती है, तो सैन्य इतिहास और धार्मिक प्रतीकों का इस प्रकार विलय जनभावनाओं को आंदोलित करने का सबसे प्रभावी साधन बन जाता है।

राजकुमार दिमित्री डोंस्कोय का प्रतीक: हमलावर नहीं, 'मातृभूमि के रक्षक' की छवि

ऑर्थोडॉक्स ईसाई परंपरा में युद्ध के समय सैनिकों के बीच पवित्र अवशेषों को ले जाना ऐतिहासिक रूप से देखा जाता रहा है, किंतु यूक्रेन के मौजूदा हालात में डोंस्कोय का चयन एक खास भू-राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा है। फोर्डहम यूनिवर्सिटी के ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन स्टडीज सेंटर के कम्युनिकेशंस डायरेक्टर और जाने-माने धार्मिक विद्वान सर्गेई चौपनिन के अनुसार, डोंस्कोय को कभी भी रूसी इतिहास में एक आक्रामक हमलावर के रूप में नहीं पढ़ाया गया। उन्हें सदैव रूसी भूमि को विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने वाले एक ढाल और 'मातृभूमि के रक्षक' के रूप में स्थापित किया गया है।

क्रेमलिन के सूचना तंत्र के लिए यह ऐतिहासिक व्याख्या बेहद सटीक बैठती है। रूसी सरकार अपने घरेलू नागरिकों और सैनिकों के सामने लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि रूस ने यूक्रेन पर कोई एकतरफा हमला नहीं किया है, बल्कि वह नाटो के विस्तार और पश्चिमी खतरों से अपनी संप्रभुता और सभ्यतागत सीमाओं की रक्षा कर रहा है। डोंस्कोय के हाथ की हड्डियों को मोर्चे पर दिखाकर यह वैचारिक ढांचा खड़ा किया जा रहा है कि आज का रूसी सैनिक भी डोंस्कोय की ही तरह अपनी मातृभूमि की पावन रक्षा का पवित्र कर्तव्य निभा रहा है, जिससे युद्ध को एक 'पवित्र संघर्ष' का दर्जा मिल जाता है।

क्रेमलिन और ऑर्थोडॉक्स चर्च का अटूट गठजोड़: राज्य और धर्म का एकाकार

साल 2022 के सैन्य अभियान के बाद से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व वाले क्रेमलिन और पैट्रियार्क किरिल की अगुवाई वाले रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के संबंध अभूतपूर्व रूप से प्रगाढ़ हुए हैं। चर्च ने रूसी विदेश नीति और सैन्य कार्रवाइयों को नैतिक और आध्यात्मिक वैधता प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। स्थिति यह बन चुकी है कि धर्म और राज्य तंत्र के बीच की विभाजन रेखा पूरी तरह धुंधली हो गई है। जब अगस्त में डोंस्कोय के इन पवित्र अवशेषों को आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक किया गया, तो इसे मॉस्को के राजनीतिक और आध्यात्मिक गलियारों में एक दैवीय घटना करार दिया गया।

राष्ट्रपति पुतिन ने इस ऐतिहासिक खोज को असाधारण और अद्वितीय बताया, वहीं पैट्रियार्क किरिल ने इसे विशेष दैवीय संकेत घोषित किया कि रूस सही मार्ग पर है और उसे ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। मॉस्को के ऐतिहासिक गिरजाघरों में जब इन अवशेषों को दर्शनार्थ रखा गया, तो लाखों रूसी नागरिकों ने अपनी आस्था व्यक्त की। इस पूरी प्रक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक आस्था को राष्ट्रीय अस्मिता के साथ जोड़कर युद्ध के प्रति समर्थन जुटाना क्रेमलिन की समग्र रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ बन चुका है।

अग्रिम मोर्चे के खंदकों में आस्था: सैनिकों के लिए आध्यात्मिक संबल या मनोवैज्ञानिक सहारा

सैन्य विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि तोपखाने के निरंतर हमलों और ड्रोन हमलों के बीच जी रहे सैनिकों के लिए धार्मिक प्रतीक एक गहरा मनोवैज्ञानिक संबल प्रस्तुत करते हैं। युद्ध के मैदान में जानलेवा जोखिमों का सामना कर रहे सैनिकों के लिए यह आस्था जीवित रहने की अंतिम उम्मीद बन जाती है। एक पूर्व रूसी सैनिक ने इस जमीनी हकीकत को बयां करते हुए स्वीकार किया कि शांति के दिनों में भले ही इंसान ईश्वर को भूल जाए, लेकिन जब बारूद की गंध और मौत सामने मंडराती है, तो हर कोई दुआएं मांगने लगता है।

पूर्वी यूक्रेन के बीहड़ों और अग्रिम मोर्चों पर बाकायदा बंकर चर्च और फील्ड चैपल बनाए गए हैं। सैन्य टुकड़ियों को किसी भी खतरनाक मिशन पर रवाना करने से पहले सैन्य पादरी यानी चैपलिन उन्हें आशीर्वाद देते हैं, पवित्र जल छिड़कते हैं और रक्षा कवच के प्रतीक भेंट करते हैं। फील्ड हॉस्पिटलों में घायलों के बिस्तरों के पास पादरियों की नियमित मौजूदगी अब रूसी सैन्य दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा है। रूसी सेना में प्रचलित यह कहावत कि 'जैसे हर मोर्चे पर फील्ड किचन आवश्यक है, वैसे ही हर बटालियन के साथ एक पादरी होना चाहिए' यह दर्शाती है कि युद्धक्षेत्र में धार्मिक कर्मकांड किस हद तक संस्थागत रूप ले चुके हैं।

जनभावनाओं की लामबंदी और आधुनिक युद्ध में आस्था का भविष्य

यूक्रेन में चल रहा युद्ध केवल आधुनिक हथियारों, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और हवाई वर्चस्व की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह पहचान, संस्कृति और इतिहास की व्याख्याओं का भी भीषण टकराव है। सदियों पुराने शासकों और योद्धा संतों की अस्थियों को आधुनिक खंदकों तक ले जाकर मॉस्को यह सुनिश्चित करना चाहता है कि युद्ध के प्रति रूसी सैनिकों का समर्पण केवल वेतन या आदेश तक सीमित न रहे, बल्कि यह उनकी आंतरिक धार्मिक प्रतिबद्धता से जुड़ जाए। इतिहास को आधुनिक राजनीति के सांचे में ढालकर पेश की जा रही यह रणनीति दर्शाती है कि सूचना और तकनीक के 21वीं सदी के युग में भी युद्ध जीतने के लिए मध्ययुगीन आस्था और धार्मिक राष्ट्रवाद सबसे मारक हथियार बने हुए हैं।

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