UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता पर रूस का जोरदार समर्थन: लावरोव बोले- पश्चिमी विस्तार अब बंद हो, ग्लोबल साउथ को मिले हक

न्यूयॉर्क/मॉस्को। न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्चस्तरीय वार्षिक सत्र के दौरान वैश्विक कूटनीति के पटल पर भारत के पक्ष में एक बड़ा और निर्णायक बयान सामने आया है। रूस के अनुभवी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) के लिए भारत की दावेदारी का पुरजोर और बिना शर्त समर्थन दोहराया है। इसके साथ ही लावरोव ने पश्चिमी देशों (अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों) की कड़ी आलोचना करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि सुरक्षा परिषद में पहले से ही पश्चिमी देशों का अत्यधिक और गैर-अनुपातिक प्रतिनिधित्व है, इसलिए परिषद में पश्चिमी राष्ट्रों के और अधिक विस्तार को रूस कभी स्वीकार नहीं करेगा।
वैश्विक शक्ति संतुलन में आ रहे बदलावों के बीच भारत लंबे समय से जी4 (G4 – भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) समूह के साथ मिलकर यूएनएससी में तत्काल और व्यापक संरचनात्मक सुधार की मांग कर रहा है। रूस की ओर से आए इस स्पष्ट बयान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को नई मजबूती प्रदान की है, जबकि उन देशों की मंशा पर पानी फेर दिया है जो परिषद में पश्चिमी प्रभाव को और गहरा करना चाहते थे।
'सुरक्षा परिषद में पश्चिमी प्रभुत्व पहले से ज्यादा, अब किसी नए पश्चिमी देश की जगह नहीं': लावरोव
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक अंतरराष्ट्रीय संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे की खामियों को उजागर किया:
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पश्चिमी देशों का जरूरत से ज्यादा प्रभाव: लावरोव ने कहा कि वर्तमान 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद (5 स्थायी और 10 गैर-स्थायी) में पश्चिमी देशों का पहले से ही भारी वर्चस्व है। 5 स्थायी सदस्यों में से तीन देश—अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस—पश्चिमी सैन्य गुट नाटो (NATO) और पश्चिमी विचारधारा का हिस्सा हैं।
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अतिरिक्त पश्चिमी विस्तार का विरोध: उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि जर्मनी या जापान जैसे पश्चिमी सहयोगियों को स्थायी सीट दी जाती है, तो यह सुरक्षा परिषद को और अधिक असंतुलित बना देगा। लावरोव के अनुसार, पश्चिमी देशों को अब कोई अतिरिक्त स्थायी या गैर-स्थायी सीट देने का कोई औचित्य नहीं रह गया है।
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गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र आवाज की जरूरत: रूसी विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद को वाशिंगटन या ब्रुसेल्स के आदेशों पर चलने वाली रबर स्टैंप संस्था बनने से रोकने के लिए विकासशील देशों का सशक्त प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
भारत और ब्राजील के लिए खुला समर्थन, अफ्रीका के प्रतिनिधित्व की भी वकालत
लावरोव ने दुनिया की तेजी से उभरती आर्थिक और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का हवाला देते हुए भारत की ऐतिहासिक भूमिका की सराहना की:
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भारत की निर्विवाद दावेदारी: रूस ने दोहराया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शांति व स्थिरता का एक मजबूत स्तंभ है। इसलिए यूएनएससी में भारत को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किए बिना सुरक्षा परिषद की वैधता और विश्वसनीयता अधूरी है।
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ग्लोबल साउथ (Global South) की मजबूत पैरवी: लावरोव ने कहा कि भारत और ब्राजील जैसे मजबूत अंतरराष्ट्रीय कद वाले देशों के साथ-साथ अफ्रीकी महाद्वीप को भी सुरक्षा परिषद में स्थायी और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जिसे दशकों से वैश्विक मंचों पर नजरअंदाज किया गया है।
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बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World): उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था बहुध्रुवीय होगी, जहां विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता के आधार पर अपने हितों की रक्षा करेंगे, न कि पश्चिमी देशों द्वारा थोपे गए 'नियम-आधारित' आदेशों के तहत।
भारत के यूएनएससी अभियान को मिली नई कूटनीतिक धार
संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा वैश्विक स्तर पर सबसे ज्वलंत विषयों में से एक बना हुआ है:
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पी-5 देशों का रुख: यूएन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ने विभिन्न अवसरों पर भारत की स्थायी सदस्यता का सैद्धांतिक समर्थन किया है, जबकि चीन लगातार वीटो पावर के दुरुपयोग और प्रक्रियागत पेचों का सहारा लेकर भारत के प्रवेश में बाधा डालता रहा है।
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सुधारों के लिए बढ़ता वैश्विक दबाव: संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र में दुनिया भर के कई राष्ट्राध्यक्षों ने यह स्वीकार किया है कि 1945 में बना द्वितीय विश्व युद्ध के दौर का यूएन ढांचा 21वीं सदी की चुनौतियों (जैसे यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा) से निपटने में पूरी तरह विफल रहा है।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का यह सख्त और स्पष्ट रुख न केवल पश्चिमी देशों के दोहरे मानकों पर प्रहार करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि भारत के बिना वैश्विक सुरक्षा और कूटनीति के किसी भी नए ढांचे की कल्पना असंभव है।