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कौन हैं थाईलैंड के ‘गणेश भक्त’ पंथौन थीरखानोन? ‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने की प्रशंसा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के जरिए एक बार फिर से दुनिया भर के लोगों का ध्यान एक ऐसी शख्सियत की ओर खींचा है, जिसने अपनी कला और संस्कृति के जरिए भारत और थाईलैंड के रिश्तों को एक नई मजबूती दी है। इस बार पीएम मोदी ने थाईलैंड के प्रसिद्ध कलाकार पंथौन थीरखानोन (Panthoun Theerkhanon) की जमकर प्रशंसा की है, जो भगवान गणेश के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा और कला के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। थाईलैंड जैसे बौद्ध बहुल देश में भगवान गणेश को समर्पित उनकी कलाकृतियां और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण आज भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है। 'मन की बात' में उनके जिक्र के बाद से ही सोशल मीडिया और इंटरनेट पर लोग उनके बारे में जानने के लिए बेहद उत्सुक हो गए हैं, जिससे भारत और थाईलैंड के ऐतिहासिक एवं पौराणिक संबंध एक बार फिर वैश्विक मंच के केंद्र में आ गए हैं।

कौन हैं पंथौन थीरखानोन और क्या है उनकी कला की विशेषता

पंथौन थीरखानोन थाईलैंड के एक बेहद प्रतिभाशाली और लोकप्रिय चित्रकार एवं मूर्तिकार हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और विशेषकर भगवान गणेश की विभिन्न मुद्राओं को अपनी कला के माध्यम से जीवंत करने में समर्पित कर दिया है। थाईलैंड की पारंपरिक कला शैली में भारतीय देवी-देवताओं, खासकर विघ्नहर्ता गणेश के रूपों को उकेरने में उन्हें महारत हासिल है। उनके द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स और मूर्तियां न केवल थाईलैंड में बल्कि अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनियों में भी काफी सराही जाती हैं। पंथौन थीरखानोन का मानना है कि कला की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती है और भगवान गणेश की ऊर्जा व प्रेरणा उन्हें हर दिन कुछ नया और रचनात्मक सृजन करने के लिए प्रेरित करती है। उनकी कलाकृतियों में भारतीय और थाई संस्कृतियों का एक बहुत ही खूबसूरत और अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो दोनों देशों के प्राचीन संबंधों की याद दिलाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में क्यों की उनकी सराहना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के माध्यम से अक्सर ऐसे गुमनाम नायकों और सांस्कृतिक दूतों को दुनिया के सामने लाते हैं जो बिना किसी बड़े प्रचार के दो देशों के बीच आपसी प्रेम और भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे हैं। पीएम मोदी ने पंथौन थीरखानोन का जिक्र करते हुए यह बताया कि किस तरह थाईलैंड के ये कलाकार भारतीय सनातन संस्कृति और भगवान गणेश के प्रति अपनी अटूट आस्था के जरिए दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने उनकी कला की सराहना करते हुए कहा कि कला और आस्था किस प्रकार सीमाओं के बंधनों को तोड़कर दो अलग-अलग देशों के नागरिकों को एक सांस्कृतिक धागे में पिरो सकती है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण पंथौन जी का जीवन और कार्य है। पीएम मोदी द्वारा की गई इस प्रशंसा ने थाईलैंड के इस महान कलाकार को भारत में भी घर-घर में लोकप्रिय बना दिया है।

थाईलैंड और भारत के बीच प्राचीन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रिश्ते

थाईलैंड और भारत के बीच के संबंध सदियों पुराने हैं, जिनकी जड़ें बौद्ध धर्म, रामायण (थाईलैंड में जिसे रामकीन कहा जाता है) और सनातन संस्कृति में गहराई तक समाई हुई हैं। थाईलैंड में भले ही बौद्ध धर्म बहुसंख्यक आबादी का मार्गदर्शक हो, लेकिन वहां आज भी हिंदू देवी-देवताओं, विशेषकर भगवान गणेश, ब्रह्मा, विष्णु और शिव की उतनी ही श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है जितनी भारत में। थाईलैंड की राष्ट्रीय मुद्रा, वहां के शाही राजचिह्नों और प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला में भारतीय पौराणिक प्रभावों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पंथौन थीरखानोन जैसे कलाकार इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक युग में अपनी तूलिका और कला के माध्यम से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, जो दोनों देशों के बीच आपसी आत्मीयता को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।

वैश्विक मंच पर भारत की सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति का प्रभाव

आज के वैश्वीकृत दौर में किसी भी देश की 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) उसकी कूटनीति का सबसे मजबूत हथियार साबित होती है, और भारत की सांस्कृतिक विरासत इसकी सबसे बड़ी ताकत है। योग, आयुर्वेद, रामायण परंपरा और भारतीय देवी-देवताओं की वैश्विक स्वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि भारत के विचार दुनिया के कोने-कोने तक सकारात्मक प्रभाव छोड़ रहे हैं। थाईलैंड के कलाकार पंथौन थीरखानोन द्वारा भगवान गणेश की आराधना और उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति इसी सॉफ्ट पावर का एक जीवंत उदाहरण है। जब देश के प्रधानमंत्री ऐसे कलाकारों को वैश्विक मंच पर मान्यता देते हैं, तो इससे न केवल कला जगत का उत्साह बढ़ता है, बल्कि दुनिया भर में भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को भी एक नई दिशा और मजबूती मिलती है। आने वाले समय में ऐसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान भारत और थाईलैंड के संबंधों को कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भी नई ऊंचाइयों पर ले जाने में मददगार साबित होंगे।

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