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क्या अक्टूबर के महीने में शेयर बाजार के पुराने जख्मों पर लगेगा मरहम

भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में हर महीने की अपनी एक अलग कहानी और चाल होती है लेकिन जब बात अक्टूबर महीने की आती है तो निवेशकों के दिल की धड़कनें अपने आप तेज हो जाती हैं क्योंकि यह महीना अपने साथ उम्मीदों और अनिश्चितताओं का एक अनूठा पिटारा लेकर आता है। पिछला सितंबर का महीना दलाल स्ट्रीट के तमाम छोटे-बड़े निवेशकों के लिए काफी उथल-पुथल भरा और कई मायनों में चिंताजनक रहा है जहां बाजार के दिग्गजों को भी भारी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा है। ऐसे में हर निवेशक के मन में बस एक ही सवाल बार-बार कौंध रहा है कि क्या कैलेंडर बदलते ही अक्टूबर का यह नया महीना सितंबर के सभी जख्मों पर मरहम लगाने का काम करेगा या फिर निवेशकों को अभी और इंतजार करना होगा। बाजार की इस चाल को गहराई से समझने और आगामी कारोबारी हफ्तों की सही रणनीति तय करने के लिए हमें पिछले पूरे दस साल के आंकड़ों को बहुत ही बारीकी से खंगालना होगा ताकि यह साफ हो सके कि ऐतिहासिक रूप से अक्टूबर का महीना निवेशकों के पोर्टफोलियो के लिए कैसा साबित होता आया है।

पिछले दस वर्षों के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि अक्टूबर में बाजार की चाल कैसी रही है

शेयर बाजार के पिछले एक दशक यानी दस साल के रिटर्न के आंकड़ों पर अगर एक सरसरी नजर डाली जाए तो यह बात बहुत स्पष्ट रूप से सामने आती है कि अक्टूबर का महीना अक्सर भारतीय बाजारों के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित होता रहा है। बाजार विशेषज्ञों और तकनीकी विश्लेषकों द्वारा किए गए पिछले वर्षों के डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि कई बार इस महीने में त्योहारी सीजन के उत्साह के चलते जबरदस्त तेजी देखने को मिली है तो वहीं कुछ खास ग्लोबल कारणों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारण गिरावट का सामना भी करना पड़ा है। पिछले दस में से लगभग सात से आठ बार ऐसा देखा गया है कि अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में सुस्ती या बिकवाली के बाद महीने के मध्य या उत्तरार्ध में बाजार ने जोरदार वापसी की है और निवेशकों को मालामाल किया है। जब भी निवेशक पिछले सालों के इन ऐतिहासिक रुझानों का अध्ययन करके अपनी निवेश रणनीति बनाते हैं, तो उन्हें यह समझने में आसानी होती है कि बाजार के इस मौजूदा दौर में घबराने के बजाय किस तरह से धैर्य रखकर सही शेयरों में पैसा लगाना चाहिए।

त्योहारी सीजन का जबरदस्त तड़का और ऑटो से लेकर कंज्यूमर गुड्स शेयरों में शानदार तेजी की उम्मीद

भारत में अक्टूबर का महीना आते ही चारों तरफ त्योहारों की धूम शुरू हो जाती है जिसमें नवरात्रि, दशहरा और दीपा जैसे बड़े पावन पर्व शामिल होते हैं जो देश के व्यापारिक जगत में नई जान फूंक देते हैं। इस त्योहारी सीजन का सीधा और सबसे गहरा सकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर पड़ता है क्योंकि बाजारों में ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है और हर सेक्टर की कंपनियों की बिक्री में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। ऑटोमोबाइल सेक्टर, एफएमसीजी यानी रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाली कंपनियां, रियल एस्टेट, बैंकिंग और खुदरा व्यापार से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में इस दौरान विशेष रूप से खरीदार टूट पड़ते हैं जिससे बाजार का सेंटिमेंट पूरी तरह से बदल जाता है। शेयर बाजार के जानकारों का मानना है कि चूंकि इस बार भी त्योहारी सीजन की शुरुआत बहुत ही जोरदार तरीके से हो रही है, इसलिए अक्टूबर के महीने में कंजम्पशन आधारित शेयरों से बाजार को एक बहुत बड़ा सहारा मिलने की पूरी उम्मीद है जो पिछले महीने के नुकसान की भरपाई आसानी से कर सकता है।

वैश्विक बाजार के संकेत और विदेशी निवेशकों की भूमिका तय करेगी बाजार की असली दिशा

घरेलू मोर्चे पर त्योहारी रौनक और मजबूत बुनियादी आधार के बावजूद इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक घटनाओं और विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई के रुख का गहरा प्रभाव पड़ता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर लिए जाने वाले फैसलों, भू-राजनीतिक तनावों और कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर इस समय देश के हर बड़े निवेशक की पैनी नजर बनी हुई है। यदि वैश्विक बाजार से किसी प्रकार के नकारात्मक संकेत नहीं मिलते हैं और विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों में एक बार फिर से शुद्ध खरीदार के रूप में लौटते हैं, तो अक्टूबर का महीना वाकई में पिछले सभी जख्मों को भुलाकर एक नई और लंबी तेजी की शुरुआत कर सकता है। ऐसे समय में निवेशकों को पूरी तरह सतर्क और अनुशासित रहकर केवल मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों के शेयरों पर ही दांव लगाना चाहिए ताकि किसी भी अचानक आने वाले वैश्विक झटके से उनके पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखा जा सके।

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