धर्म

आज का पंचांग 2 अक्टूबर: सप्तमी श्राद्ध पर व्यतिपात व वरीयान योग, जानें भद्रा, राहुकाल और तर्पण का शुभ मुहूर्त

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि आज 2 अक्टूबर को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है। पितृपक्ष (महालय) का यह पावन समय हमारे पूर्वजों, पितरों और दिवंगतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। आज के दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ हो। ज्योतिषीय गणना के अनुसार आज के दिन व्यतिपात और वरीयान जैसे विशिष्ट खगोलीय योग बन रहे हैं, जिनका सनातन परंपरा और कर्मकांड में गहरा आध्यात्मिक प्रभाव माना गया है।

लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार और गया जी सहित देश के तमाम प्रमुख तीर्थों व पवित्र नदियों के तट पर सुबह से ही श्रद्धालु अपने पितरों की तृप्ति के लिए तिल, कुश और गंगाजल लेकर तर्पण कर रहे हैं। आज के दिन किए गए दान-पुण्य और ब्राह्मण भोज से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सूर्योदय, चंद्रोदय और ग्रह-नक्षत्रों की सटीक स्थिति

आज शुक्रवार 2 अक्टूबर को ग्रह और नक्षत्रों का संयोग आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष प्रभाव डाल रहा है:

  • सूर्योदय: सुबह 06:15 बजे

  • सूर्यास्त: शाम 06:04 बजे

  • चंद्रमा की स्थिति: चंद्रमा दिन-रात वृषभ राशि में संचार करेंगे।

  • सूर्य की स्थिति: सूर्य देव कन्या राशि में विराजमान हैं।

  • पक्ष व संवत: आश्विन कृष्ण पक्ष, विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948

  • तिथि: आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि (इसके उपरांत अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी)।

  • नक्षत्र: मृगशिरा नक्षत्र (इसके बाद आर्द्रा नक्षत्र का प्रवेश होगा)।

  • योग: दिन के प्रथम भाग में व्यतिपात योग और इसके उपरांत वरीयान योग का प्रभाव रहेगा।

  • करण: विष्टि (भद्रा) करण, जिसके बाद बव और बालव करण का प्रभाव रहेगा।

सप्तमी श्राद्ध के लिए तर्पण और पिंडदान का सबसे उत्तम मुहूर्त

पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातःकाल या संध्याकाल के समय नहीं किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार दोपहर के समय जब सूर्य का तेज मध्याह्न में होता है, तब 'कुतुप' और 'रौहिण' मुहूर्त में किया गया श्राद्ध पितरों तक सीधे पहुंचता है:

  • कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक (यह श्राद्ध आरंभ करने का सबसे श्रेष्ठ समय है)।

  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 बजे से दोपहर 01:23 बजे तक (इस अवधि में पिंडदान और तर्पण अत्यंत फलदायी होता है)।

  • अपराह्न काल: दोपहर 01:23 बजे से दोपहर 03:45 बजे तक (ब्राह्मण भोज और पंचबलि कर्म पूरा करने का समय)।

श्राद्ध कर्म के दौरान 'पंचबलि' का विशेष नियम है, जिसमें भोजन का पहला अंश गाय (गोबलि), दूसरा कुत्ते (श्वानबलि), तीसरा कौवे (काकबलि), चौथा देवादि और पांचवां चींटियों (पिपीलिकादि) को समर्पित किया जाता है। इसके पश्चात ही ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा और वस्त्र भेंट किए जाते हैं।

राहुकाल, भद्रा और अशुभ समय: इन घड़ियों में न करें शुभ कार्य

आज के दिन शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत करने से पहले अशुभ चौघड़िया और राहुकाल का ध्यान रखना अनिवार्य है:

  • राहुकाल: सुबह 10:42 बजे से दोपहर 12:11 बजे तक (राहुकाल के दौरान कोई भी नया कार्य, लेन-देन या यात्रा प्रारंभ करने से बचें)।

  • यमगंड: दोपहर 03:09 बजे से शाम 04:38 बजे तक।

  • गुलिक काल: सुबह 07:44 बजे से सुबह 09:13 बजे तक।

  • भद्रा का वास: आज दिन के पूर्वार्ध में भद्रा (विष्टि करण) का प्रभाव रहेगा। भद्रा पाताल या स्वर्ग लोक में होने के कारण पृथ्वी वासियों के लिए इसका दुष्प्रभाव शून्य माना जाता है, तथापि लौकिक शुभ कार्यों में सावधानी बरती जाती है। श्राद्ध और तर्पण जैसे नित्य पितृ कर्मों पर भद्रा का कोई निषेध लागू नहीं होता है।

  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक (यह दिन का सबसे पवित्र और दोषमुक्त मुहूर्त है)।

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:09 बजे से दोपहर 02:57 बजे तक।

लखनऊ से गया जी तक पितृ विसर्जन की परंपरा और पंचबलि का नियम

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गोमती तट से लेकर प्रयागराज के संगम, काशी के मणिकर्णिका-दशाश्वमेध घाट और बिहार के फल्गु नदी तट स्थित गया तीर्थ तक आज सप्तमी श्राद्ध को लेकर भारी संख्या में श्रद्धालु जुट रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी जातक को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि ठीक से याद न हो, तो वे आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी या आगे आने वाली सर्वपितृ अमावस्या के दिन विधि-विधान से तर्पण कर सकते हैं।

आज के दिन काले तिल, जौ का आटा, कच्चा गाय का दूध, सफेद फूल और कुश की पवित्री अनामिका उंगली में धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने से तीन पीढ़ियों के पितृ तृप्त होकर अपने वंशजों को आरोग्यता और मानसिक शांति का वरदान प्रदान करते हैं।

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