लखनऊ के प्राइवेट अस्पतालों में लूट का काला खेल बेनकाब

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (Lucknow), जिसे चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में पूरे प्रदेश का एक बड़ा हब माना जाता है, वहां से स्वास्थ्य व्यवस्था को झकझोर देने वाली एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर खबर सामने आ रही है। लखनऊ के कई बड़े और नामी-गिरामी निजी अस्पतालों (Private Hospitals) में इलाज कराने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों की जेब पर किस प्रकार से सरेआम डाका डाला जा रहा है, इसका खुलासा हाल ही में सामने आई एक विस्तृत जांच और रिपोर्ट से हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, ये प्राइवेट अस्पताल थोक बाजार या फार्मा कंपनियों से बहुत ही कम दामों पर—यानी लगभग 60 प्रतिशत तक भारी डिस्काउंट पर—जीवनरक्षक दवाएं और मेडिकल सर्जिकल कंज्यूमेबल्स खरीदते हैं, लेकिन जब मरीजों को बिल थमाया जाता है, तो उनसे दवाओं की पूरी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP वसूली जाती है। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज और उनके परिजन पहले से ही अस्पताल के भारी-भरकम बेड चार्ज, डॉक्टर की फीस और जांच के खर्चों के तले दबे होते हैं, ऐसे में दवाओं पर इस प्रकार का अंधाधुंध मुनाफाखोरी का खेल उनके लिए आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला साबित हो रहा है। आम जनता और स्वास्थ्य संगठनों द्वारा इस अनैतिक व्यापारिक प्रवृत्ति के खिलाफ अब तीखा रोष व्यक्त किया जा रहा है और स्वास्थ्य विभाग से सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है।
लखनऊ के निजी अस्पतालों में मुनाफाखोरी का यह पूरा खेल और मरीजों की मजबूरी
जब कोई मरीज गंभीर अवस्था में लखनऊ के किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होता है, तो उसकी आपातकालीन स्थिति और डॉक्टरों पर अटूट भरोसे का फायदा उठाकर अस्पताल प्रबंधन अपनी इन-हाउस फार्मेसी (Hospital Pharmacy) के जरिए दवाओं की मनमानी कीमतें वसूलना शुरू कर देता है। अस्पताल के अंदर की फार्मेसी से ही दवाएं खरीदना मरीजों की एक मजबूरी बना दी जाती है, क्योंकि बाहर की दवा दुकानों से सामान लाने की अनुमति या तो बहुत सीमित होती है या फिर नियमों के नाम पर रोक लगा दी जाती है। थोक दवा बाजारों में जो दवाइयां या इंजेक्शन 40 प्रतिशत या उससे भी कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं, उन्हीं उत्पादों को अस्पतालों के बिल में 100 प्रतिशत एमआरपी पर जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार से एक ही मरीज के इलाज के दौरान दवाओं के बिल पर अस्पताल प्रबंधन हजारों और लाखों रुपये का अतिरिक्त मुनाफा सीधे तौर पर कमा रहा है, जिसका सीधा नुकसान आम और मध्यमवर्गीय परिवारों को उठाना पड़ रहा है, जो अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इलाज में खर्च कर देते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता अधिकारों के जानकारों की चिंताजनक प्रतिक्रियाएं
स्वास्थ्य क्षेत्र के नीति-निर्माताओं और उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करने वाले विशेषज्ञों का यह मानना है कि चिकित्सा जैसे पवित्र और मानवीय क्षेत्र में इस प्रकार की व्यावसायिक लूट को किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाना चाहिए। जब अस्पताल मरीजों को इलाज के नाम पर एक व्यावसायिक ग्राहक (Commercial Consumer) की तरह देखना शुरू कर देते हैं, तो चिकित्सा का मूल नैतिक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली पर्चियों में ऐसी विशेष ब्रांडेड दवाएं लिखी जाती हैं जो केवल उसी अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं, जिससे मरीजों के पास महंगे दामों पर दवा खरीदने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य निदेशालय और जिला प्रशासन को इस गंभीर मामले का तुरंत संज्ञान लेना चाहिए ताकि लखनऊ के इन मुनाफाखोर अस्पतालों पर लगाम लगाई जा सके और मरीजों को इस आर्थिक शोषण से बचाया जा सके।
प्रशासन और सरकार से सख्त नियम बनाने तथा ऑडिट की पुरजोर मांग
इस प्रकार के मामलों के उजागर होने के बाद अब शहर के जागरूक नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़ित परिवारों की ओर से यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि सरकार को प्राइवेट अस्पतालों की फार्मेसी और उनके बिलिंग सिस्टम पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे थोक में खरीदी गई दवाओं की वास्तविक लागत और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमतों के बीच एक पारदर्शी संतुलन रखें, ताकि अत्यधिक मुनाफाखोरी पर रोक लग सके। समय-समय पर स्वास्थ्य विभाग की टीमों द्वारा इन अस्पतालों के मेडिकल स्टोर्स का औचक निरीक्षण और स्टॉक ऑडिट किया जाना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि वे थोक विक्रेताओं से किस दर पर दवाएं खरीद रहे हैं और मरीजों को किस दर पर बेच रहे हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों के लाइसेंस रद्द करने जैसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई ही इस प्रकार की प्रवृत्ति को रोक सकती है।
आम जनता के लिए सजग रहने और अपने अधिकारों को जानने का संदेश
जब तक प्रशासन की ओर से कोई व्यापक और कड़ा नीतिगत कदम नहीं उठाया जाता, तब तक मरीजों और उनके तीमारदारों को भी अपनी तरफ से पूरी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। अस्पताल में भर्ती होने से पहले या इलाज के दौरान मिलने वाले एस्टीमेट में दवाओं की सूची और उनकी कीमतों के बारे में खुलकर बात करें, और यदि संभव हो तो डॉक्टर से यह अनुरोध करें कि वे जेनेरिक या सामान्य ब्रांड की दवाएं लिखें जो बाहर आसानी से और कम कीमत पर मिल सकें। आपकी थोड़ी सी जागरूकता और सवाल पूछने की आदत न केवल आपके पैसों को बचा सकती है, बल्कि इन मुनाफाखोर अस्पतालों के गलत तरीकों पर भी रोक लगाने में मदद कर सकती है। स्वास्थ्य और जीवन अनमोल हैं, और किसी को भी मजबूरी का फायदा उठाकर आपकी जेब पर डाका डालने का अधिकार नहीं होना चाहिए।