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बांग्लादेश में भीड़ ही बनी अदालत: बिना जांच और सुनवाई खुद सुनाया फैसला; 8 महीने में 154 लोगों की पीट-पीटकर हत्या

बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल और शेख हसीना सरकार के पतन के बाद देश की कानून-व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतरती नजर आ रही है। मानवाधिकार संस्थाओं और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों से सामने आए ताजा आंकड़ों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, बीते 8 महीनों के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में उग्र भीड़ द्वारा पीट-पीटकर कम से कम 154 लोगों की बेरहमी से हत्या (Mob Lynching) कर दी गई है। सड़क से लेकर कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों तक हालात ऐसे हो चुके हैं मानो भीड़ ने खुद को अदालत घोषित कर दिया हो—जहां किसी पर भी महज शक के आधार पर आरोप तय होता है, बिना किसी पुलिस जांच के फैसला सुनाया जाता है और मौके पर ही मौत की सजा दे दी जाती है।

न सबूत, न निष्पक्ष जांच: महज अफवाहों और आरोपों पर बर्बरता

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन मॉब लिंचिंग की अधिकांश घटनाओं में पीड़ितों को अपनी बेगुनाही साबित करने या पुलिस से सुरक्षा मांगने का कोई मौका तक नहीं दिया गया।

  • चोरी और डकैती के झूठे शक: कई मामलों में मामूली चोरी, मवेशी चुराने या आपसी रंजिश के मामलों को भीड़ ने मौके पर ही 'कंगारू कोर्ट' (Kangaroo Court) में बदल दिया।

  • कथित ईशनिंदा और धार्मिक आरोप: धार्मिक भावनाओं को आहत करने या ईशनिंदा के मनगढ़ंत आरोपों के नाम पर अल्पसंख्यकों और असहाय नागरिकों को निशाना बनाया गया। हालिया महीनों में मयमनसिंह, रंगपुर और चटगांव जैसे इलाकों में कई ऐसे मामले दर्ज हुए जहां बिना किसी प्राथमिक जांच के लोगों को पीट-पीटकर मार डाला गया और उनके शवों तक को जला दिया गया।

  • सहकर्मियों और परिचितों का विश्वासघात: जांच एजेंसियों की रिपोर्टों से यह भी खुलासा हुआ है कि कई मामलों में फैक्ट्रियों और दफ्तरों के प्रबंधकों ने उग्र भीड़ के दबाव में आकर खुद अपने ही कर्मचारियों को भीड़ के हवाले कर दिया ताकि संपत्ति को नुकसान से बचाया जा सके।

पुलिस व्यवस्था पस्त, वर्दी का खौफ खत्म होने से मनमानी

विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं (Human Rights Activists) का मानना है कि बांग्लादेश में पुलिसिंग व्यवस्था पूरी तरह निष्क्रिय और भयभीत हो चुकी है। जुलाई-अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन और हिंसक विद्रोह के बाद से पुलिसकर्मियों के मनोबल में भारी गिरावट आई है।

  • कई घटनाओं के दौरान जब पुलिस मौके पर पहुंची, तो उग्र और हिंसक भीड़ को देखकर वह या तो पीछे हट गई या केवल मूकदर्शक बनी रही।

  • थानों और सुरक्षा बलों की असमर्थता का फायदा उठाकर चरमपंथी तत्व, असामाजिक गिरोह और कट्टरपंथी संगठन कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं।

  • न्यायपालिका और कानूनी प्रक्रिया पर अविश्वास का ऐसा माहौल खड़ा किया जा रहा है जिससे आम जनता का संवैधानिक संस्थाओं से भरोसा उठ रहा है।

अल्पसंख्यकों और राजनीतिक विरोधियों पर बढ़ा खतरा

8 महीने में 154 लोगों की लिंचिंग का यह आंकड़ा केवल सामान्य अपराधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय, अन्य धार्मिक समूहों और पूर्ववर्ती सत्ता से जुड़े लोगों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मानवाधिकार आयोगों का कहना है कि जब समाज में भीड़ को सजा देने की खुली छूट मिल जाती है, तो इसका सबसे पहला शिकार समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक वर्ग बनते हैं। विश्व स्तर पर मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र ने भी अंतरिम प्रशासन से तुरंत सख्त कदम उठाने और कानून का राज बहाल करने की अपील की है।

अंतरिम सरकार की निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के तमाम दावों और सख्त बयानों के बावजूद जमीनी स्तर पर भीड़ हिंसा की घटनाओं में कोई कमी नहीं आ रही है। यद्यपि कुछ चुनिंदा हाई-प्रोफाइल मामलों में त्वरित कार्रवाई करते हुए गिरफ्तारियां की गई हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर त्वरित सजा और कानून के प्रति खौफ न होने के कारण ऐसी बर्बरता बार-बार दोहराई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि अंतरिम सरकार ने त्वरित न्याय, पुलिस सुधार और मॉब लिंचिंग में शामिल तत्वों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए सख्त सजा सुनिश्चित नहीं की, तो बांग्लादेश पूरी तरह एक अराजक और कानूनविहीन 'भीड़तंत्र' में तब्दील हो जाएगा।

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