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महाराष्ट्र में ‘महा’कोहराम: सूखे की मार और कर्ज के बोझ तले दबे अन्नदाता, अकोला में 7 दिन के भीतर 4 किसानों ने की आत्महत्या

देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिने जाने वाले महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों से अन्नदाताओं की बेबसी और बदहाली की दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य के विदर्भ अंचल अंतर्गत आने वाले अकोला जिले में पिछले महज 7 दिनों के भीतर 4 कर्जदार किसानों ने मौत को गले लगा लिया है। मॉनसून की भारी बेरुखी, बारिश के अभाव में खेतों में खड़ी फसलों के सूखने और बैंकों व साहूकारों के बढ़ते कर्ज के दबाव ने किसानों को इस चरम और आत्मघाती कदम की ओर धकेल दिया है। लगातार हो रही इन मौतों ने राज्य प्रशासन, कृषि नीतियों और आपदा राहत तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अकोला में एक के बाद एक 4 मौतें: सूख चुके कुएं में कूदकर दी जान

विदर्भ के अकोला जिले में बीते एक सप्ताह के दौरान जिन चार किसानों की जान गई है, उनकी व्यथा लगभग एक जैसी है—कर्ज का बोझ और बर्बाद होती फसल।

  • सुकोडा गांव की त्रासदी: सुकोडा निवासी संतोष नेमाडे ने गांव के ही एक पूरी तरह सूख चुके कुएं में छलांग लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। परिजनों के मुताबिक संतोष ने कर्ज उठाकर करीब दो एकड़ जमीन में सोयाबीन की बुवाई की थी। लंबे समय से बारिश न होने के कारण पूरी फसल जलकर खाक हो गई। पिछले तीन-चार दिनों से वे कर्ज चुकाने की भारी चिंता में थे और इसी मानसिक तनाव ने उनकी जान ले ली।

  • अन्य किसानों ने भी गंवाई जान: इसी जिले के गाजीपुर गांव के सतीश पटोंड, सिंदखेड़-मोरेश्वर के देवीदास डाबेराव और खापरखेड़ के गणेश भोकरे ने भी कर्ज और फसल नुकसान के चलते आत्महत्या कर ली। एक ही हफ्ते में चार घरों के चिराग बुझने से पूरे इलाके में मातम और आक्रोश का माहौल है।

सोयाबीन झुलसी और कपास में नहीं आए फूल, चारे का भी संकट

इस वर्ष महाराष्ट्र के कई हिस्सों, विशेषकर विदर्भ और मराठवाड़ा में मॉनसून ने किसानों को बड़ा झटका दिया है। समय पर और पर्याप्त बारिश न होने के कारण अकोला सहित आसपास के जिलों में सोयाबीन की फसल खेतों में ही सूख चुकी है।

  • वहीं नकदी फसल कपास की बात करें तो पानी की कमी के चलते पौधों में उम्मीद के मुताबिक फूल और गूलर नहीं आए हैं।

  • किसानों का कहना है कि उन्होंने महंगे दामों पर बीज, खाद और कीटनाशक खरीदे थे, जिसके लिए सहकारी बैंकों और स्थानीय साहूकारों से ऊंचा ब्याज देकर कर्ज लिया था।

  • हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि मवेशियों के लिए पीने का पानी और हरा चारा तक मिलना मुश्किल हो गया है।

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं विदर्भ-मराठवाड़ा का पुराना दर्द

महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का संकट कोई नया नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक अनसुलझी त्रासदी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वार्षिक रिपोर्टों के मुताबिक, देश भर में कृषि और किसानी से जुड़े लोगों की आत्महत्या के मामलों में महाराष्ट्र लगातार पहले पायदान पर बना रहता है। देश में होने वाली किसानों की कुल आत्महत्याओं में से लगभग हर दूसरी या तीसरी मौत अकेले महाराष्ट्र में दर्ज होती है। प्राकृतिक आपदाओं की अनिश्चितता, भूजल स्तर का पाताल में जाना, सिंचाई परियोजनाओं का अधूरा रहना और कृषि उपजों के उचित व लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अभाव किसानों को स्थायी कर्ज के जाल में फंसाए रखता है।

केवल कागजी घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, तत्काल राहत पैकेज की मांग

अकोला और विदर्भ के किसान संगठनों व स्थानीय ग्रामीणों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए दो टूक कहा है कि सरकार को केवल आश्वासनों और औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसानों की मांग है कि:

  • प्रभावित जिलों में तत्काल सूखा घोषित किया जाए और फसलों के नुकसान का युद्धस्तर पर पंचनामा कराया जाए।

  • बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा कर्ज वसूली के लिए भेजे जा रहे नोटिसों और दबाव पर तुरंत रोक लगाई जाए।

  • पीड़ित परिवारों को विशेष आर्थिक मुआवजा देने के साथ-साथ अगली फसल की बुवाई और मवेशियों के चारे के लिए सीधी नकद सहायता उपलब्ध कराई जाए।

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