इस्लामाबाद की धरती से भारत के रुख का खुला समर्थन, सदमे में डूबा पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीति के गलियारों में एक ऐसा बड़ा भूचाल आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है और पाकिस्तान को गहरे सदमे में डाल दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सर्वोच्च प्रमुख ने सीधे पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद की धरती से भारत के उस पुराने और अडिग रुख का पुरजोर समर्थन किया है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता और व्यापक सुधारों की मांग लंबे समय से की जा रही है। वैश्विक स्तर पर शक्ति संतुलन को बदल देने वाले इस अप्रत्याशित कूटनीतिक घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति के समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। दशकों से सुरक्षा परिषद में वीटो पावर और स्थायी सीट पाने के लिए कूटनीतिक जंग लड़ रहे भारत के लिए इसे एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि इस बयान ने पाकिस्तानी हुक्मरों और वहां के रणनीतिकारों के पैरों तले जमीन खिसका दी है।
इस्लामाबाद में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख का बड़ा बयान और भारत के पक्ष में वैश्विक सहमति का बढ़ता दायरा
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के दौरे पर पहुंचे संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारी द्वारा दिया गया यह बयान वहां के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में किसी बड़े झटके से कम नहीं था। पाकिस्तान की जमीन से इस प्रकार की वैश्विक घोषणा होना यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर चुका है कि इक्कीसवीं सदी की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए वैश्विक संस्थाओं में बदलाव करना अब टाला नहीं जा सकता है। भारत लंबे समय से यह तर्क देता आ रहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश और सबसे बड़े लोकतंत्र को संयुक्त राष्ट्र के सबसे ताकतवर मंच यानी सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए। यूएन प्रमुख द्वारा इस्लामाबाद में इस बात को रेखांकित किया जाना कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पुरानी हो चुकी है और वैश्विक दक्षिण की आवाज को दबाया नहीं जा सकता, सीधे तौर पर भारतीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता को साबित करता है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की अनिवार्यता और भारत की स्थायी सदस्यता की मजबूत दावेदारी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद किया गया था, जिसके बाद से वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और जनसंख्या के आंकड़ों में जमीन-आसमान का बदलाव आ चुका है। भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील जैसे देश लंबे समय से 'ग्रुप ऑफ फोर' के तहत यूएनएससी में विस्तार की मांग कर रहे हैं ताकि दुनिया के हर हिस्से को उचित और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिल सके। भारत की दावेदारी इसलिए भी सबसे मजबूत मानी जाती है क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में शामिल है और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति और ग्लोबल साउथ के नेतृत्वकर्ता के रूप में भारत ने जिस प्रकार से अपनी कूटनीतिक पकड़ मजबूत की है, उसके बाद दुनिया का कोई भी देश भारत की अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। यूएन प्रमुख का यह समर्थन इस बात पर मुहर लगाता है कि भारत का सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना अब केवल समय की बात है।
पाकिस्तान के खेमे में गहरी निराशा और कूटनीतिक मोर्चे पर मिली करारी हार का पूरा सच
पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रमुख का यह बयान किसी सदमे या बड़े आघात से कम नहीं है, क्योंकि वह दशकों से भारत की वैश्विक कूटनीति को कमजोर करने के लिए हरसंभव हथकंडे अपनाता रहा है। पाकिस्तान की हमेशा से यह कोशिश रही है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग किया जाए और कश्मीर तथा अन्य मुद्दों पर झूठा प्रोपेगेंडा फैलाकर वैश्विक सहानुभूति बटोरी जाए। लेकिन इस्लामाबाद में ही खड़े होकर यूएन प्रमुख द्वारा भारत के रुख का समर्थन करना पाकिस्तान के लिए एक कूटनीतिक तमाचे की तरह है, जिससे वहां की सरकार और विदेश मंत्रालय में खलबली मच गई है। पाकिस्तानी मीडिया और विश्लेषक इस बात से हैरान हैं कि उनके अपने घर में बैठकर दुनिया के सबसे बड़े संगठन के प्रमुख ने भारत की मजबूत दावेदारी की वकालत कैसे कर दी। यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब कोरे प्रोपेगेंडा या झूठे बयानों से नहीं, बल्कि देश की वास्तविक आर्थिक ताकत, स्थिरता और वैश्विक योगदान के आधार पर तय होती है, और इस मामले में भारत ने पाकिस्तान को बहुत पीछे छोड़ दिया है।