ब्रिटिश पीएम एंडी बर्नहैम का सनसनीखेज दावा, मॉस्को ने खारिज कर बताया ‘रूस विरोधी हिस्टीरिया’

ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर ऐतिहासिक जनमत संग्रह को लेकर जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय भूचाल आ गया है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने एक बड़ा और सनसनीखेज दावा करते हुए आरोप लगाया है कि साल 2016 में हुए ऐतिहासिक ब्रेग्जिट जनमत संग्रह में रूस ने सीधा दखल दिया था। यूरोपीय संघ से अलग होने के फैसले को लेकर आए इस बयान ने लंदन से लेकर मॉस्को तक राजनयिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। हालांकि, प्रधानमंत्री बर्नहैम ने अपने इस गंभीर दावे के समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेज या सबूत सार्वजनिक नहीं किया है और न ही यह स्पष्ट किया है कि रूस ने किस तकनीक या रणनीति के जरिए इस मतदान को प्रभावित करने की कोशिश की थी। इसके साथ ही उन्होंने जर्मनी और फ्रांस के नागरिकों और मतदाताओं को भी आगाह किया है कि वे अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विदेशी हस्तक्षेप और साइबर दुष्प्रचार को लेकर पूरी तरह सतर्क रहें।
रूस ने आरोपों को सिरे से नकारा, ब्रिटेन पर लगाया हिस्टीरिया का आरोप
लंदन स्थित रूसी दूतावास ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री के इन बयानों पर बेहद कड़ा और तीखा पलटवार किया है। मॉस्को ने इन तमाम दावों को पूरी तरह बेबुनियाद और मनगढ़ंत बताते हुए खारिज कर दिया है। रूसी दूतावास की ओर से जारी आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया कि ब्रिटेन लंबे समय से रूस विरोधी हिस्टीरिया से ग्रस्त है और अपनी आंतरिक राजनीतिक नाकामियों व प्रशासनिक विफलताओं का ठीकरा हमेशा दूसरों के सिर फोड़ने की कोशिश करता रहा है। रूस ने साफ शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक देशों की आंतरिक राजनीति या चुनावों को प्रभावित करने का उसका कोई इरादा नहीं रहता, जबकि पश्चिमी देश बिना किसी ठोस प्रमाण के बार-बार इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना आरोप लगाते रहते हैं।
ब्रिटिश सरकार ने संभाला मोर्चा: 'ब्रेग्जिट का जनादेश पूरी तरह वैध और निष्पक्ष'
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद पैदा हुए विवाद को देखते हुए ब्रिटिश सरकार के मंत्रियों ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश शुरू कर दी है। कैबिनेट ऑफिस और विदेश राज्य मंत्री स्टीफन डौटी ने इस मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि भले ही विदेशी ताकतों या रूस की ओर से दुष्प्रचार की छिटपुट कोशिशें की गई हों, लेकिन वे जनमत संग्रह के अंतिम परिणाम को किसी भी तरह से प्रभावित करने में पूरी तरह नाकाम रहीं। ब्रिटिश सरकार ने जोर देकर कहा कि 2016 के ब्रेग्जिट का जनादेश पूरी तरह से वैध, लोकतांत्रिक और ब्रिटिश जनता की संप्रभु इच्छा का प्रतीक है। सरकार का यह बयान इस बात को पुख्ता करता है कि जनमत संग्रह की निष्पक्षता और उसकी संवैधानिक वैधता पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता।
2016 के ऐतिहासिक जनमत संग्रह और खुफिया रिपोर्ट की पृष्ठभूमि
साल 2016 में हुए ऐतिहासिक जनमत संग्रह में ब्रिटेन के 52 प्रतिशत मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने यानी ब्रेग्जिट के पक्ष में मतदान किया था, जिसने आधुनिक यूरोप की राजनीतिक और आर्थिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया था। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी साल 2020 में स्पष्ट रूप से कहा था कि जनमत संग्रह में किसी भी तरह के रूसी दखल का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है। इसके अलावा साल 2020 में ब्रिटिश खुफिया और सुरक्षा समिति द्वारा जारी एक विस्तृत खुफिया रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि सरकार और जांच एजेंसियां यह साबित करने में विफल रहीं कि रूस ने वास्तव में ब्रेग्जिट को प्रभावित किया था। हालांकि उस रिपोर्ट में पूर्व के अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों और जनमत प्रक्रियाओं में विदेशी हस्तक्षेप के प्रयासों के संकेतों का जिक्र जरूर किया गया था, लेकिन ब्रेग्जिट के फैसले पर इसका सीधा असर साबित नहीं हो सका था।