यूपी चुनाव और राजनीतिक दलों की फंडिंग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से राजनीतिक भ्रष्टाचार और चुनावी फंडिंग को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और चर्चित मामले में बड़ी खबर सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर टिकट बेचे जाने के गंभीर आरोपों की विशेष जांच दल (SIT) या सीबीआई (CBI) से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से सुप्रीम कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि इस तरह के नीतिगत और राजनीतिक मामलों में न्यायिक दखलंदाजी करना उचित नहीं है। इस याचिका के खारिज होने के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या भारतीय चुनाव प्रणाली और पार्टी टिकट वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए कोई ठोस कानूनी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।
क्या था पूरा मामला और याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने रखे थे कौन से गंभीर आरोप?
यह पूरा कानूनी मामला चुनावी राजनीति के भीतर चल रही कालेधन की भूमिका और टिकट वितरण में कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल करते हुए यह आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दल विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान अपने चहेतों या मोटी रकम चुकाने वाले लोगों को टिकट बेच देते हैं, जिससे आम और ईमानदार कार्यकर्ताओं की मेहनत की अनदेखी होती है। याचिका में यह भी कहा गया था कि इस प्रकार के अवैध लेन-देन और चुनावी भ्रष्टाचार के कारण राजनीति का अपराधीकरण तेजी से बढ़ रहा है और आम जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ रहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के वित्तीय लेन-देन और टिकट बंटवारे की प्रक्रिया की एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई से इनकार करते हुए क्या दी महत्वपूर्ण कानूनी दलील?
मामلا जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या संबंधित सर्वोच्च पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया, तो अदालत ने याचिका के गुण-दोष पर विचार करने से ही मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों के आंतरिक कामकाज, टिकट वितरण के तौर-तरीकों और चुनावी रणनीतियों में अदालत सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार के मामले नीतिगत मामलों (Policy Matters) के दायरे में आते हैं और इसके लिए संसद, चुनाव आयोग (Election Commission of India) और राजनीतिक दलों को खुद अपने स्तर पर सुधार करने की जरूरत है। अदालत ने यह माना कि हालांकि राजनीतिक शुचिता और पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन हर राजनीतिक या प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी न्यायपालिका द्वारा नहीं की जा सकती, जिसके बाद याचिका को खारिज कर दिया गया।
चुनाव आयोग की भूमिका, चुनावी बॉन्ड और भविष्य में राजनीतिक सुधारों की जरूरत
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस विशेष याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया हो, लेकिन चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे और पैसों के खेल को लेकर देश में लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक देश की राजनीतिक पार्टियां अपने आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) को मजबूत नहीं करतीं और फंडिंग के स्रोतों को पूरी तरह से पारदर्शी नहीं बनातीं, तब तक इस तरह के आरोप लगते रहेंगे। चुनाव आयोग भी समय-समय पर राजनीतिक दलों के खर्च और चंदे की निगरानी के लिए कड़े नियम बनाता रहता है, लेकिन जमीनी स्तर पर टिकट वितरण प्रणाली को और अधिक जवाबदेह बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस फैसले के बाद अब सारा दारोमदार एक बार फिर से निर्वाचन आयोग और संसद पर आ गया है कि वे किस प्रकार देश की चुनावी राजनीति को अधिक स्वच्छ और निष्पक्ष बना सकते हैं।