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मोदी कैबिनेट से 78 दिनों के बोनस को हरी झंडी की तैयारी, खाते में सीधे आएंगे ₹17,951; जानिए पूरा फॉर्मूला

देशभर के लाखों रेल कर्मचारियों के लिए त्योहारी सीजन की शुरुआत इस बार भी बेहद खास और आर्थिक रूप से राहत भरी होने जा रही है। शारदीय नवरात्रि, दुर्गा पूजा और दशहरे के पावन पर्व से ठीक पहले भारतीय रेल के नॉन-गजेटेड (अराजपत्रित) कर्मचारियों को हर साल मिलने वाले प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस (पीएलबी) को लेकर सुगबुगाहट अपने चरम पर पहुंच गई है। रेल मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के बीच आंतरिक चर्चाओं के बाद प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल की अंतिम मंजूरी की दहलीज पर है। परंपरा के अनुसार, केंद्र सरकार दुर्गा पूजा की छुट्टियों और विजयदशमी से ठीक पहले रेलवे के लगभग 11 लाख से अधिक कर्मचारियों के बैंक खातों में इस प्रोत्साहन राशि का सीधा हस्तांतरण करती है। पिछले कई वित्तीय वर्षों की तरह इस बार भी रेलकर्मियों को रिकॉर्ड 78 दिनों का बोनस दिए जाने की प्रबल संभावना है। रेलवे के विशाल नेटवर्क को दिन-रात सुरक्षित और सुचारू बनाए रखने वाले जमीनी कर्मचारियों के लिए यह केवल एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि त्योहारी खर्चों को बिना किसी आर्थिक तनाव के पूरा करने का सबसे बड़ा सहारा बनकर सामने आता है।

₹230.26 का दैनिक आधार और 78 दिन का हिसाब: समझिए ₹17,951 का पूरा गणित

अक्सर आम लोगों और कर्मचारियों के मन में यह सवाल उठता है कि जब कर्मचारियों का मूल वेतन (बेसिक पे) सातवें वेतन आयोग के बाद 18,000 रुपये या उससे अधिक है, तो बोनस की यह रकम ठीक 17,951 रुपये ही क्यों तय होती है। इस गणित को समझना बेहद आसान है। दरअसल, रेलवे में प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस की गणना के लिए एक वैधानिक न्यूनतम मजदूरी सीमा (वेज सीलिंग) निर्धारित की गई है, जो वर्तमान में 7,000 रुपये प्रति माह है। जब इस 7,000 रुपये के मासिक वेतन को मानक 30.4 दिनों के औसत आधार पर विभाजित किया जाता है, तो एक दिन का पारिश्रमिक लगभग ₹230.26 निकलकर आता है। जब इस दैनिक दर यानी ₹230.26 को स्वीकृत 78 दिनों की कार्य अवधि से गुणा किया जाता है, तो कुल देय राशि ₹17,960.28 (राउंड ऑफ होकर विभिन्न भत्तों के समायोजन के बाद अधिकतम ₹17,951) बैठती है। यही कारण है कि पद या वरिष्ठता चाहे जो भी हो, न्यूनतम वेतन सीमा पर आधारित होने के कारण प्रत्येक पात्र नॉन-गजेटेड कर्मचारी को 78 दिन के बोनस के रूप में यह तयशुदा राशि सीधे उनके वेतन खाते में ट्रांसफर की जाती है।

ट्रैक मेंटेनर्स से लेकर लोको पायलट तक: किन्हें मिलेगा यह वित्तीय लाभ और कौन रहेगा बाहर?

भारतीय रेल द्वारा दिया जाने वाला यह बोनस अधिकारियों के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से सिस्टम की रीढ़ कहे जाने वाले ग्रुप 'सी' और ग्रुप 'डी' कर्मचारियों के पसीने का सम्मान है। इस दायरे में रेलवे के सबसे चुनौतीपूर्ण काम करने वाले ट्रैक मेंटेनर, की-मैन, गैंगमैन, लोको पायलट (ट्रेन ड्राइवर), सहायक लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर (गार्ड), स्टेशन मास्टर, प्वाइंट्समैन, शंटिंग स्टाफ, केबिन मैन, सिग्नल और टेलीकॉम मेंटेनेंस टेक्नीशियन, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल वर्कशॉप के कारीगर, शेड स्टाफ और मिनिस्टिरियल (कार्यालयीन लिपिक) कर्मचारी शामिल हैं। हालांकि, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएसएफ) के जवानों को इस विशिष्ट पीएलबी योजना से अलग रखा जाता है, क्योंकि उनके लिए गृह मंत्रालय और रेल सुरक्षा नियमावली के तहत एड-हॉक (तदर्थ) बोनस का अलग प्रावधान लागू होता है। इसके अलावा, ग्रुप 'ए' और ग्रुप 'बी' के राजपत्रित (गजेटेड) अधिकारियों को प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस नहीं दिया जाता।

रेलवे यूनियनों का पक्ष: पुरानी सीलिंग हटाने और 7वें वेतन आयोग पर गणना की पुरानी मांग

भले ही 78 दिनों का बोनस मिलने से कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ जाती है, लेकिन ऑल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन (एआईआरएफ) और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन्स (एनएफआईआर) जैसी प्रमुख रेल यूनियनों का रुख इस पर हमेशा से थोड़ा अलग और गंभीर रहा है। यूनियनों का तर्क है कि 7,000 रुपये की मासिक गणना सीमा अब पूरी तरह से अप्रासंगिक और पुरानी हो चुकी है। जब सातवें वेतन आयोग के तहत न्यूनतम मूल वेतन ही 18,000 रुपये तय कर दिया गया है, तो बोनस की गणना 7,000 रुपये की काल्पनिक सीमा पर करना कर्मचारियों के वास्तविक योगदान के साथ न्याय नहीं है। यूनियनों का स्पष्ट कहना है कि यदि बोनस की गणना कर्मचारियों के वास्तविक न्यूनतम वेतन यानी 18,000 रुपये प्रति माह के आधार पर की जाए, तो 78 दिनों का बोनस 45,000 रुपये से अधिक होना चाहिए। बावजूद इसके, यूनियनों का मानना है कि त्योहारों के मौके पर बिना किसी कटौती या देरी के 78 दिनों की राशि खाते में आना कर्मचारियों के लिए तुरंत नकदी का बड़ा स्रोत साबित होता है।

सरकारी खजाने पर दो हजार करोड़ का भार और स्थानीय बाजारों में रौनक की बयार

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिलते ही केंद्र सरकार के खजाने पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय भार पड़ेगा। आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल एक सरकारी खर्च नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी यानी नकदी प्रवाह का एक जबर्दस्त इंजन है। जैसे ही देश के प्रमुख रेल मंडलों—चाहे वह लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, प्रयागराज, दानापुर, कोलकाता या बिलासपुर हो—के लाखों कर्मचारियों के हाथों में यह पैसा पहुंचता है, स्थानीय बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, कपड़े, मिठाइयों और रियल एस्टेट सेक्टर में मांग तेजी से बढ़ जाती है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में स्थित रेलवे कॉलोनियों के आसपास के बाजारों में दशहरे से लेकर दिवाली तक जो खरीदारी की चमक दिखाई देती है, उसका एक बहुत बड़ा श्रेय इसी बोनस राशि को जाता है। यह बोनस बाजार के लिए एक त्वरित कंज्यूमर बूस्टर की तरह काम करता है।

कब तक खाते में आएगी राशि: डिजिटल पेमेंट और अंतिम चरण की तैयारियां

रेलवे बोर्ड के प्रशासनिक गलियारों से मिल रहे संकेतों के मुताबिक, जोनल स्तर पर सभी पे-रोल यूनिट्स और अकाउंट्स डिपार्टमेंट को डेटा तैयार रखने के मौखिक निर्देश दिए जा चुके हैं। जैसे ही केंद्रीय कैबिनेट की आगामी बैठक में औपचारिक अनुमोदन की घोषणा होगी, संबंधित जोनल मुख्यालयों द्वारा तत्काल एडवाइस जारी कर दी जाएगी। इसके बाद पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (पीएफएमएस) और इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सर्विस (ईसीएस) के माध्यम से कर्मचारियों के खातों में एक से दो कार्यदिवसों के भीतर राशि क्रेडिट कर दी जाएगी। सामान्यतः यह प्रक्रिया पितृपक्ष की समाप्ति और नवरात्रि के पहले या दूसरे दिन पूरी कर ली जाती है, ताकि कर्मचारी विजयदशमी से काफी पहले अपने परिवारों के लिए त्योहार की योजनाएं बना सकें। रेल कर्मचारियों के लिए यह बोनस केवल एक वित्तीय भत्ता नहीं, बल्कि सालभर 24 घंटे धूप, बारिश और ठंड में रेल पटरियों पर डटे रहने के उनके अथक परिश्रम का एक औपचारिक सम्मान भी है।

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