भारत-ब्रिटेन रिश्तों का ऐतिहासिक दौर: यूके डिप्टी हाई कमिश्नर स्टीव हिकलिंग ने एफटीए को बताया गेमचेंजर

वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के पटल पर भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के आर्थिक संबंध आज अपने सबसे सुनहरे और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं। दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA / CETA) के सकारात्मक परिणाम अब जमीनी स्तर पर दिखने लगे हैं, जिसने दोनों देशों के कॉरपोरेट जगत में एक नई ऊर्जा भर दी है। गुजरात और राजस्थान में ब्रिटेन के डिप्टी हाई कमिश्नर स्टीव हिकलिंग (Steve Hickling) ने समाचार एजेंसी आईएएनएस (IANS) के साथ एक विशेष बातचीत में इस बात की पुष्टि की है कि यह व्यापारिक समझौता दोनों मुल्कों की कंपनियों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक परस्पर लाभकारी (Win-Win) सौदा साबित हो रहा है। हिकलिंग ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि ब्रिटेन और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी वर्तमान में इतिहास के सर्वोच्च स्तर पर है। यह सकारात्मक बदलाव उस ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का सीधा नतीजा है, जिसने व्यापारिक बाधाओं को दूर कर पूंजी और तकनीक के सुगम आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त किया है। उन्होंने साझा किया कि हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठकों में उत्तरी इंग्लैंड के तीन कैबिनेट स्तर के मंत्रियों और सात प्रमुख शहरों के मेयरों ने भारतीय नीति-निर्माताओं और उद्योगपतियों के साथ गहन विचार-विमर्श किया है, जिसका मुख्य एजेंडा इस समझौते के जरिए दोनों देशों के औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना और आपसी निवेश को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाना है।
भारतीय उद्योगों में ब्रिटिश पूंजी की बाढ़: ग्रीन एनर्जी, डिफेंस और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग बने नए केंद्र
डिप्टी हाई कमिश्नर के अनुसार, भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में ब्रिटिश निवेशकों और वैश्विक बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। भारत के कई प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की जा रही है। इनमें सबसे आगे रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन टेक्नोलॉजी का क्षेत्र है, जहां भारत के महत्वाकांक्षी नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ब्रिटिश कंपनियां सोलर, विंड, ग्रीन हाइड्रोजन और बैटरी स्टोरेज टेक्नोलॉजी में भारी पूंजी निवेश कर रही हैं। इसके साथ ही रक्षा और एयरोस्पेस (Aerospace & Defense) विनिर्माण में भी एक नया अध्याय जुड़ गया है। ब्रिटेन की दिग्गज रक्षा कंपनियां 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत भारतीय सार्वजनिक व निजी रक्षा उपक्रमों के साथ मिलकर सह-विकास और सह-उत्पादन के बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। हेल्थकेयर, लाइफ साइंसेज और फार्मास्युटिकल्स में दोनों देशों का साझा शोध और विनिर्माण नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। इसके अतिरिक्त, ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स, एडवांस्ड इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित आईटी सॉल्यूशंस में ब्रिटिश फर्मों ने भारतीय टेक क्लस्टर्स में अपनी वित्तीय मौजूदगी को दोगुना कर दिया है, जिससे भारत के औद्योगिक परिदृश्य को अत्याधुनिक ब्रिटिश तकनीक का सीधा लाभ मिल रहा है।
भारतीय निर्यातकों और एमएसएमई की खुली लॉटरी: 99% उत्पादों पर जीरो टैरिफ से चमकेगा एक्सपोर्ट
इस समझौते का सबसे प्रभावशाली पहलू भारतीय घरेलू उत्पादकों, निर्यातकों और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (MSME) को मिला अभूतपूर्व सुरक्षा कवच और वैश्विक बाजार का विस्तार है। एफटीए के लागू होने के साथ ही भारत से ब्रिटेन को निर्यात होने वाली लगभग 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर आयात शुल्क पूरी तरह शून्य हो गया है। श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे रेडीमेड गारमेंट्स, टेक्सटाइल्स, चमड़ा (लेदर), फुटवियर, जेम्स एंड ज्वैलरी, हैंडीक्राफ्ट्स और समुद्री उत्पादों (मरीन प्रोडक्ट्स) को अब यूके के विशाल उपभोक्ता बाजार में बिना किसी टैक्स बाधा के सीधी एंट्री मिल रही है। पहले जहां भारतीय टेक्सटाइल्स पर 8 से 12 फीसदी का भारी आयात शुल्क लगता था, वहीं अब इसके शून्य हो जाने से भारत के कपड़े बांग्लादेश, पाकिस्तान और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में ब्रिटिश रिटेल स्टोर्स में काफी सस्ते और आकर्षक हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर और उन्नाव का लेदर उद्योग, लखनऊ का पारंपरिक चिकनकारी व हैंडीक्राफ्ट बाजार, भदोही का कालीन उद्योग, तमिलनाडु का तिरुप्पुर, गुजरात का सूरत और पंजाब का लुधियाना टेक्सटाइल हब इस ड्यूटी-फ्री व्यवस्था से सीधे वैश्विक सप्लाई चेन का अभिन्न हिस्सा बन रहे हैं। इस ऐतिहासिक रियायत से भारतीय निर्यातकों के मार्जिन में भारी इजाफा हुआ है और देश के विनिर्माण क्षेत्र में लाखों नए ऑर्डर्स आने शुरू हो गए हैं।
2030 तक 115 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य: लाखों नए रोजगार और पेशेवरों को पंख
भारत और यूनाइटेड किंगडम के आर्थिक संबंधों का पैमाना केवल मौजूदा आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दीर्घकालिक लक्ष्य अत्यंत महत्वाकांक्षी और दूरगामी है। दोनों देशों की सरकारों ने द्विपक्षीय व्यापार को साल 2025-26 के लगभग 58 अरब डॉलर से बढ़ाकर वर्ष 2030 तक 115 से 120 अरब डॉलर तक पहुंचाने का स्पष्ट रोडमैप निर्धारित किया है। व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि इस लक्ष्य के हासिल होते ही दोनों देशों में विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और सेवा क्षेत्रों में करीब 7 से 10 लाख नए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे। सर्विस सेक्टर के मोर्चे पर यह समझौता भारतीय कुशल कामगारों के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो रहा है। समझौते के तहत सामाजिक सुरक्षा अंशदान (Social Security Contribution) में मिली विशेष राहत से ब्रिटेन में अस्थायी रूप से तैनात हजारों भारतीय आईटी और वित्तीय पेशेवरों को हर साल करोड़ों रुपये की सीधी बचत हो रही है। भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स, डेटा साइंटिस्ट्स, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और स्वास्थ्यकर्मियों की यूके में गतिशीलता (मोबिलिटी) सुगम होने से भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व में जबर्दस्त इजाफे की उम्मीद जगी है। दूसरी तरफ ब्रिटेन के प्रीमियम उत्पाद, जैसे स्कॉच व्हिस्की, जिन, उन्नत मशीनरी और लग्जरी ऑटोमोबाइल्स पर भारत में आयात शुल्क के क्रमिक रेशनलाइजेशन से भारतीय उपभोक्ताओं को भी वाजिब दामों पर अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध हो रहे हैं।
उत्तरी इंग्लैंड के मंत्रियों और मेयरों का दिल्ली मंथन: क्षेत्रीय सहयोग और राज्यों से सीधा जुड़ाव
डिप्टी हाई कमिश्नर स्टीव हिकलिंग ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान जिस एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर जोर दिया, वह था दोनों देशों के बीच कूटनीति का विकेंद्रीकरण। उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली पहुंचे ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल में उत्तरी इंग्लैंड (Northern England) के तीन वरिष्ठ मंत्री और मैनचेस्टर, लिवरपूल, लीड्स तथा शेफील्ड जैसे औद्योगिक नगरों का प्रतिनिधित्व करने वाले सात निर्वाचित मेयर शामिल थे। यह दौरा इस बात का परिचायक है कि ब्रिटेन अब केवल लंदन केंद्रित निवेश की बात नहीं कर रहा, बल्कि अपने औद्योगिक रूप से समृद्ध उत्तरी क्षेत्रों को भारत के प्रगतिशील राज्यों के साथ सीधे जोड़ रहा है। यह प्रतिनिधिमंडल केवल राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और राजस्थान जैसे आर्थिक रूप से अग्रणी राज्यों में निवेश की संभावनाओं को तलाशा है। ब्रिटिश मेयरों और व्यापारिक प्रतिनिधियों ने भारतीय टियर-2 और टियर-3 शहरों में बन रहे नए इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स, डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स (जैसे यूपी डिफेंस कॉरिडोर) और मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क्स का अध्ययन किया है। ब्रिटेन का लक्ष्य यह है कि मैनचेस्टर की कपड़ा तकनीक, शेफील्ड की उन्नत धातु इंजीनियरिंग और लीड्स के फाइनेंशियल टेक इकोसिस्टम को सीधे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग हब्स के साथ जेवी (जॉइंट वेंचर) के जरिए जोड़ा जाए, जिससे दोनों देशों के क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार और उद्यमशीलता को नई ताकत मिल सके।
बदलती वैश्विक भू-राजनीति में आत्मनिर्भर भारत और ब्रिटेन की साझी आर्थिक ढाल
रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया के तनाव और लाल सागर संकट के चलते जब पूरी दुनिया में आपूर्ति श्रृंखलाएं (सप्लाई चेन्स) चरमरा रही हैं, तब भारत और ब्रिटेन का यह मजबूत आर्थिक गठबंधन वैश्विक स्थिरता का एक नया दीपस्तंभ बनकर उभरा है। ब्रेक्जिट के बाद यूरोपीय संघ से बाहर निकले ब्रिटेन को जहां एक बड़े, स्थिर, लोकतांत्रिक और तेजी से बढ़ते बाजार की सख्त दरकार थी, वहीं भारत को 2047 तक 'विकसित भारत' बनने के संकल्प को पूरा करने के लिए आधुनिक तकनीक, विदेशी पूंजी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्बाध पहुंच की आवश्यकता थी। स्टीव हिकलिंग का यह ताजा बयान इसी रणनीतिक तालमेल की औपचारिक पुष्टि करता है। जब दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें निष्पक्ष, नियम-आधारित और टैरिफ-मुक्त व्यापार के मंच पर हाथ मिलाती हैं, तो उसका असर केवल कंपनियों के बैलेंस शीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह दोनों देशों के आम नागरिकों की जेब, युवाओं के करियर और आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा को एक ठोस गारंटी प्रदान करता है। भारत-यूके एफटीए ने यह सिद्ध कर दिया है कि परस्पर विश्वास और आर्थिक दूरदर्शिता के दम पर पुरानी औपनिवेशिक छाया को पीछे छोड़कर 21वीं सदी की सबसे सशक्त और टिकाऊ द्विपक्षीय साझेदारी का निर्माण कैसे किया जाता है।