Starlink on Ambani Statement: मुकेश अंबानी के स्पेक्ट्रम बयान पर स्टारलिंक का पलटवार, भारत में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर कही बड़ी बात

भारत के दूरसंचार क्षेत्र में आगामी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं (Satellite Broadband Services) को लेकर रिलायंस जियो के चेयरमैन मुकेश अंबानी और दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक (Starlink) के बीच चल रही जुबानी और नीतिगत जंग अब एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। हाल ही में मुकेश अंबानी द्वारा सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर दिए गए कड़े बयान और नीलामी (Auction) की मांग पर अब स्टारलिंक ने सीधा और निर्णायक जवाब दिया है। स्पेसएक्स (SpaceX) के स्वामित्व वाली स्टारलिंक ने स्पष्ट किया है कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट का मकसद जमीनी टेलीकॉम नेटवर्क से प्रतिस्पर्धा करना नहीं, बल्कि देश के उन दुर्गम, पहाड़ी और दूरदराज के अंचलों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाना है जहां पारंपरिक फाइबर या मोबाइल टावर लगाना तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के तकनीकी गलियारों से लेकर दिल्ली के संचार भवन और वैश्विक निवेशकों के बीच इस बयानबाजी को भारतीय डिजिटल परिदृश्य के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
मुकेश अंबानी की आपत्ति: समान सेवा के लिए समान नीलामी का नियम
इस पूरे टकराव की शुरुआत तब हुई जब रिलायंस जियो और भारती एयरटेल जैसे घरेलू टेलीकॉम दिग्गजों ने केंद्र सरकार और भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) के समक्ष अपनी पुरानी मांग को फिर से जोरदार तरीके से उठाया। मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस समूह का तर्क है कि भारत में मोबाइल ऑपरेटरों ने 4G और 5G सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम हासिल करने के वास्ते सरकारी नीलामियों में लाखों करोड़ रुपये का भारी निवेश किया है। ऐसे में यदि विदेशी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड कंपनियों—जैसे स्टारलिंक और अमेज़न के प्रोजेक्ट कुइपर (Project Kuiper)—को बिना नीलामी के केवल प्रशासनिक आवंटन (Administrative Allocation) के जरिए सीधे स्पेक्ट्रम सौंप दिया जाता है, तो यह घरेलू कंपनियों के साथ घोर अन्याय होगा और 'समान सेवा, समान नियम' (Level Playing Field) के सिद्धांत का खुला उल्लंघन माना जाएगा। जियो ने साफ तौर पर मांग रखी है कि सभी प्रकार के कमर्शियल स्पेक्ट्रम की खुली ई-नीलामी कराई जाए ताकि सरकारी खजाने को भी अधिकतम राजस्व मिल सके।
स्टारलिंक का सीधा जवाब: सैटेलाइट स्पेक्ट्रम और टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम का विज्ञान अलग
रिलायंस के इस रुख पर स्टारलिंक और एलन मस्क की ग्लोबल पॉलिसी टीम ने अपना पक्ष रखते हुए तकनीकी अंतर को रेखांकित किया है। स्टारलिंक ने अपने जवाब में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के वैश्विक मानकों के अनुसार सैटेलाइट स्पेक्ट्रम कभी भी किसी एक कंपनी का अनन्य या प्राइवेट एकाधिकार नहीं होता। पारंपरिक मोबाइल स्पेक्ट्रम (Terrestrial Spectrum) को किसी एक कंपनी को आवंटित करने के बाद दूसरा उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता, जबकि सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी को एक ही समय में कई वैश्विक ऑपरेटर आपस में साझा (Shared Spectrum) कर सकते हैं। स्टारलिंक का कहना है कि दुनिया के लगभग सभी विकसित और विकासशील देशों में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का प्रशासनिक आवंटन ही मानक प्रक्रिया है। यदि भारत में इसके लिए भारी-भरकम नीलामी मॉडल थोपा जाता है, तो इससे बुनियादी ढांचे की लागत बहुत बढ़ जाएगी, जिसका सीधा बोझ आम भारतीय उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा और देश का डिजिटल विभाजन (Digital Divide) गहरा होगा।
भारत में हाई-स्पीड इंटरनेट को लेकर स्टारलिंक का बड़ा विजन
स्टारलिंक ने भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि उनकी तकनीक का असली उद्देश्य देश के 140 करोड़ नागरिकों को विश्वस्तरीय इंटरनेट स्पीड से जोड़ना है। कंपनी का दावा है कि उनके लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स के जरिए भारत के सबसे सुदूर गांवों, लद्दाख और पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों, द्वीपों, जंगलों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी 100 से 200 एमबीपीएस (Mbps) की रॉकेट जैसी इंटरनेट गति बेहद कम लेटेंसी के साथ उपलब्ध कराई जा सकती है। स्टारलिंक ने अपने बयान में संकेत दिया कि भारत में उनका लक्ष्य शहरी उपभोक्ताओं को जियो फाइबर या एयरटेल ब्रॉडबैंड से छीनना नहीं है, बल्कि उन करोड़ों वंचित नागरिकों, ग्रामीण स्कूलों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सीमावर्ती चौकियों को मुख्यधारा के इंटरनेट से जोड़ना है जो आजादी के दशकों बाद भी कनेक्टिविटी के अभाव में जूझ रहे हैं।
केंद्र सरकार का नया टेलीकॉम कानून और ट्राई का रुख
भारत सरकार ने हाल ही में लागू किए गए नए दूरसंचार अधिनियम (Telecommunications Act) में पहले ही यह स्पष्ट प्रावधान रखा है कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का आवंटन प्रशासनिक प्रक्रिया (Administrative Allocation) के तहत ही किया जाएगा, न कि खुली नीलामी के जरिए। हालांकि, इस आवंटन के एवज में कंपनियों से कितनी फीस, लाइसेंस शुल्क और वार्षिक लेवी ली जाएगी, इसका अंतिम फॉर्मूला तैयार करने का जिम्मा ट्राई (TRAI) को सौंपा गया है। ट्राई इस समय विभिन्न पक्षों, टेलीकॉम कंपनियों और वैश्विक सैटेलाइट ऑपरेटरों के साथ विस्तृत परामर्श कर रहा है। केंद्र सरकार का मानना है कि प्रशासनिक आवंटन से सेवाएं जल्द शुरू हो सकेंगी और विदेशी निवेश आकर्षित होगा, जबकि घरेलू टेलीकॉम कंपनियां इस बात पर अड़ी हैं कि सैटेलाइट सेवाओं का उपयोग केवल बैकहॉल या गैर-व्यावसायिक कामों तक सीमित रखा जाए, न कि सीधे खुदरा उपभोक्ताओं को सेवा बेचने में।
भारतीय उपभोक्ताओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए क्या होंगे मायने
इस कॉर्पोरेट टकराव का सीधा असर देश के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाला है। यदि स्टारलिंक, वनवेब और जियो सैटेलाइट भारत में अपनी पूर्ण वाणिज्यिक सेवाएं शुरू करते हैं, तो भारत अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट सेवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन सकता है। ग्रामीण इलाकों में उच्च गति का इंटरनेट मिलने से डिजिटल शिक्षा, टेली-मेडिसिन, एग्री-टेक और वर्क-फ्रॉम-होम के नए आयाम खुलेंगे। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल सेवा की लागत को लेकर रहेगा। यदि नियामक तंत्र संतुलित रहता है और उपकरण (स्टारलिंक डिश) की कीमतें भारतीय बाजार के अनुकूल रखी जाती हैं, तो यह तकनीक देश के दूरदराज के क्षेत्रों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। फिलहाल सबकी निगाहें संचार मंत्रालय और ट्राई के अंतिम नियमों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि आकाश से उतरने वाले इस इंटरनेट का नियंत्रण किसके हाथों में रहेगा।