भारत-अमेरिका संबंध: दोस्ती अपनी जगह, पर सर्वोपरि रहेगा देशहित

ग्लोबल जिओपॉलिटिक्स के मौजूदा दौर में भारत और अमेरिका के संबंध एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहां एक तरफ गहरी रणनीतिक साझीदारी है, तो दूसरी तरफ अपने-अपने राष्ट्रीय हित। वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक यह संदेश पूरी तरह साफ हो चुका है कि भारत अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक और रक्षात्मक रिश्ते तो चाहता है, लेकिन कभी भी अपने स्वाभिमान और देशहित की कीमत पर किसी के आगे झुकने को तैयार नहीं है। हाल के दिनों में व्यापार, टैरिफ नीतियों और रूस-यूक्रेन संकट जैसे वैश्विक मुद्दों पर दोनों महाशक्तियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। इन वैश्विक हलचलों ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि 21वीं सदी का नया भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय 'मल्टी-अलाइनमेंट' और अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता देता है।
दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच साझीदारी हमेशा सीधी रेखा में नहीं चली है। रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर जहां 'पैन-सिलिका' (Pax Silica) पहल, क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क और 'क्वॉड' (QUAD) के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देश एकजुट नजर आते हैं, वहीं नीतिगत फैसलों में भारत का रुख पूरी तरह आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रहा है। अमेरिका हमेशा से चाहता रहा है कि भारत पश्चिमी देशों के दबाव में आकर रूस से ऊर्जा आयात बंद करे और अमेरिकी नीतियों का अक्षरशः पालन करे। लेकिन भारतीय कूटनीति ने वैश्विक मंचों पर बार-बार यह साबित किया है कि देश के नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना और घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना प्राथमिकता है। यही कारण है कि अमेरिकी पाबंदियों और दबाव के बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता बनाए रखी और अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं किया।
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के बीच व्यापारिक खींचतान भी रिश्तों में उतार-चढ़ाव की मुख्य वजह रही है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ और शुल्क लगाने की नीतियों ने व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) की बातचीत में कई बार गतिरोध पैदा किया है। हालांकि, व्यापक आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए दोनों पक्षों ने आपसी बातचीत के जरिए टैरिफ दरों को नियंत्रित करने और $500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि वह व्यापारिक सौदों में अपने किसानों, स्थानीय उद्योगों और बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के साथ कोई रियायत नहीं देगा। अमेरिकी बाजार में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का बड़ा दबदबा है, जिससे अमेरिका भी भारत को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकता।
तनावों के बावजूद, दोनों देशों के सैन्य संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंचे हैं। रक्षा सहयोग के 10-वर्षीय फ्रेमवर्क, सह-उत्पादन सौदों और सेमीकंडक्टर तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे आधुनिक तकनीकी सहयोगों ने इस रिश्ते को नई मजबूती दी है। 'नासा-इसरो' (NISAR) का संयुक्त अंतरिक्ष मिशन और महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण यह दर्शाता है कि मतभेदों के बावजूद रणनीतिक आवश्यकताएं दोनों को करीब लाती हैं। भारत ने अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय 'मेक इन इंडिया' के तहत भारत में ही हथियारों के निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर जोर दिया है, जो उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
आज का भारत यह भली-भांति समझता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन, केवल स्थायी हित होते हैं। भारत-अमेरिका के रिश्ते इसी वास्तविकता पर टिके हैं। अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ एक मजबूत संतुलन के रूप में देखता है, जबकि भारत अमेरिका को तकनीक और पूंजी के बड़े स्रोत के रूप में। इस mutual dependency के बीच भारत अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग जारी रहेगा, लेकिन भारत की विदेश नीति का मूल आधार यही रहेगा—"दोस्ती अपनी जगह, पर देशहित सर्वोपरि।"