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नवजातों के भोजन में एडेड शुगर पर पूर्ण प्रतिबंध की तैयारी: FSSAI ने जारी किया कड़ा ड्राफ्ट, बदलेंगे नियम

नवजात बच्चों के पोषण और दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है। नियामक संस्था ने 6 महीने तक के बच्चों के लिए बनने वाले व्यावसायिक शिशु आहार यानी इन्फेंट मिल्क फॉर्मूला और बेबी फूड में किसी भी प्रकार की अतिरिक्त चीनी यानी एडेड शुगर (Added Sugar) मिलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का नया ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार किया है। देश भर में बाल रोग विशेषज्ञों, पोषण वैज्ञानिकों और जागरूक अभिभावकों द्वारा लंबे समय से उठाई जा रही मांगों के बाद FSSAI ने खाद्य सुरक्षा मानकों को वैश्विक स्तर पर अपग्रेड करने की दिशा में यह ठोस पहल की है। इस नए नियम का सीधा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में बिकने वाले डिब्बाबंद शिशु आहार में केवल प्राकृतिक रूप से मौजूद शर्करा ही रहे, ताकि शुरुआती महीनों से ही बच्चों के शरीर में रिफाइंड या कृत्रिम मिठास का प्रवेश न हो सके।

नवजात शिशुओं के भोजन में एडेड शुगर पर पूरी रोक का नया मसौदा

FSSAI द्वारा तैयार किए गए नए मसौदे के तहत खाद्य सुरक्षा और मानक (विशेष आहार उपयोग या विशेष चिकित्सीय उपयोग या कार्यात्मक खाद्य पदार्थ या नए खाद्य पदार्थ) विनियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। नए दिशानिर्देशों के अनुसार, छह महीने तक की उम्र के बच्चों के लिए तैयार किए जाने वाले इन्फेंट फॉर्मूला में सुक्रोज, कॉर्न सिरप, फ्रुक्टोज या किसी भी प्रकार के रिफाइंड स्वीटनर का अलग से इस्तेमाल पूरी तरह गैर-कानूनी होगा। उत्पाद में केवल वही शर्करा मान्य होगी जो दूध के प्राकृतिक घटक लैक्टोज (Lactose) के रूप में स्वाभाविक तौर पर मौजूद रहती है। यदि कोई बहुराष्ट्रीय या घरेलू कंपनी छह महीने तक के नवजातों के आहार में अतिरिक्त मिठास या फ्लेवर्ड शुगर मिलाती पाई गई, तो उत्पाद को सीधे तौर पर मिलावटी और स्वास्थ्य मानकों के प्रतिकूल घोषित किया जाएगा।

शुरुआती उम्र में अतिरिक्त चीनी से बच्चों की सेहत को क्या खतरे हैं?

बाल स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के पहले छह महीनों में शिशु का पाचन तंत्र, लिवर और अग्न्याशय (Pancreas) बहुत संवेदनशील होते हैं। इस नाजुक दौर में यदि बच्चों को एडेड शुगर वाला डिब्बाबंद आहार दिया जाए, तो उनके शरीर में इंसुलिन का संतुलन बिगड़ने लगता है और मीठे स्वाद की लत पड़ जाती है। यही लत आगे चलकर बचपन में ही मोटापे (Childhood Obesity), दांतों के सड़ने, कमजोर मेटाबॉलिज्म और भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज व हृदय रोगों का मुख्य कारण बनती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी पहले छह महीने तक केवल स्तनपान और उसके बाद सुरक्षित, बिना अतिरिक्त चीनी वाले पूरक आहार की सिफारिश करता है। FSSAI के इस कदम से शिशुओं की पोषण संबंधी नींव प्राकृतिक और सुरक्षित रूप से मजबूत होगी।

बेबी फूड कंपनियों की पैकेजिंग और लेबलिंग पर क्या लागू होंगे नियम?

इस नए प्रस्ताव के लागू होने के बाद बेबी फूड और इन्फेंट न्यूट्रिशन बनाने वाली सभी कंपनियों को अपनी पैकेजिंग, सामग्री सूची और पोषण लेबल में भारी बदलाव करने होंगे। निर्माताओं को डिब्बे के फ्रंट पैनल पर स्पष्ट और बड़े अक्षरों में यह घोषित करना होगा कि उत्पाद में 'शून्य अतिरिक्त चीनी' (No Added Sugar) है। इसके अलावा किसी भी तरह के भ्रामक दावों, जैसे कि मिठास को प्राकृतिक बताकर सिरप मिलाने की अनुमति नहीं होगी। खाद्य सुरक्षा विभाग बाजार से बिकने वाले फॉर्मूला मिल्क के बैच की रैंडम लैब जांच करेगा, जिसमें कार्बोहाइड्रेट प्रोफाइल का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा ताकि प्राकृतिक लैक्टोज और जोड़ी गई अतिरिक्त चीनी के बीच अंतर को तकनीकी रूप से पकड़ा जा सके।

सार्वजनिक सुझावों के बाद देश भर में लागू होगा अंतिम कानून

FSSAI ने इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को विस्तृत परामर्श के लिए सार्वजनिक दायरे में रखा है, ताकि सभी संबंधित पक्षों को अपनी राय देने का अवसर मिले। निर्धारित 60 दिनों की समय सीमा के भीतर बाल रोग विशेषज्ञ, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उपभोक्ता अधिकार मंच, माता-पिता और खाद्य उद्योग के प्रतिनिधि अपने तकनीकी सुझाव और प्रतिक्रियाएं दर्ज करा सकेंगे। सभी सुझावों की समीक्षा और वैज्ञानिक पैनल के अंतिम अनुमोदन के बाद इसे आधिकारिक तौर पर राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा। कानून के लागू होते ही नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाने, उत्पाद का स्टॉक जब्त करने और विनिर्माण लाइसेंस रद्द करने जैसे कड़े दंडात्मक प्रावधान प्रभावी हो जाएंगे।

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