विदेश

भारत दौरे से पहले मार्को रुबियो का बड़ा बयान: भारत हमारा अहम सहयोगी, रूसी तेल खरीद पर समझाई वाशिंगटन की समझ

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की बहुप्रतीक्षित नई दिल्ली यात्रा से ठीक पहले दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में गर्मजोशी और व्यावहारिक समझ की नई बयार देखने को मिली है। वाशिंगटन में मीडिया से बातचीत करते हुए रुबियो ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और वैश्विक मंच पर अमेरिका का एक अनिवार्य और अटूट रणनीतिक साझेदार करार दिया। सबसे अहम बात यह रही कि पिछले कई महीनों से पश्चिमी देशों के बीच चर्चा का विषय बने रूस से भारत के कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात पर अमेरिकी विदेश मंत्री ने बेहद संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले विशाल देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा पहली प्राथमिकता है और वाशिंगटन इस मामले में भारत की व्यावहारिक मजबूरियों को पूरी तरह समझता है। उनके इस सकारात्मक बयान ने दौरे से पहले दोनों पक्षों के बीच किसी भी संभावित कूटनीतिक तल्खी की आशंकाओं को खारिज कर दिया है।

रूस से कच्चे तेल की खरीद पर अमेरिका का नरम रुख क्यों?

यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी क्रूड की खरीद को लेकर पश्चिमी मीडिया में कई बार सवाल उठाए गए थे। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री ने इस मुद्दे पर वस्तुस्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि अमेरिका वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता चाहता है। यदि भारत जैसे बड़े आयातक अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल की खरीद पूरी तरह बंद कर देते या दूसरे पारंपरिक स्रोतों पर अत्यधिक दबाव डालते, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 140 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकती थीं, जिसका सीधा झटका पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगता। रुबियो ने रेखांकित किया कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य रूस के युद्ध राजस्व को सीमित करना है, न कि भारत जैसे विश्वसनीय मित्र राष्ट्रों के आम नागरिकों के जीवनयापन और महंगाई को संकट में डालना।

ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भारतीय विदेश नीति की जीत

भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि भारत की विदेश नीति 'राष्ट्रीय हित सर्वोपरि' के सिद्धांत पर आधारित है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह तर्क रखा है कि देश के मध्यम वर्ग और किसानों को किफायती दरों पर पेट्रोल, डीजल और उर्वरक मुहैया कराना सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। मार्को रुबियो का यह बयान भारतीय कूटनीति की एक बड़ी रणनीतिक जीत माना जा रहा है, जिसने यह साबित किया है कि भारत किसी भी बाहरी दबाव में आए बिना अपनी संप्रभु प्राथमिकताओं को सुरक्षित रखते हुए भी वाशिंगटन के साथ मजबूत साझेदारी बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम है।

द्विपक्षीय वार्ता के एजेंडे में क्या-क्या रहेगा शामिल?

विदेश मंत्री रुबियो के इस उच्चस्तरीय भारत दौरे के दौरान नई दिल्ली में कई अहम रणनीतिक और आर्थिक समझौतों पर मुहर लगने की संभावना है:

  • द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Trade Deal): दोनों देशों के बीच प्रस्तावित ट्रेड एग्रीमेंट के पहले चरण को अंतिम रूप देने पर गहन चर्चा होगी, जिसमें तकनीकी सहयोग, टैरिफ कटौती और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना शामिल है।

  • रक्षा और उन्नत तकनीक (iCET): क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज (iCET) पहल के तहत सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जेट इंजन सौदे और रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन को तेज रफ्तार दी जाएगी।

  • क्वॉड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा: चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच समुद्री सुरक्षा, हिंद महासागर में निर्बाध नेविगेशन और आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण पर दोनों देश साझा रोडमैप तैयार करेंगे।

वैश्विक कूटनीति में भारत की केंद्रीय भूमिका

अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि आज के बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व में भारत की स्थिति किसी एक गुट तक सीमित नहीं है। भारत जहां एक ओर ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के जरिए रूस और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ सक्रिय है, वहीं दूसरी ओर क्वाड और द्विपक्षीय मंचों पर अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ का सबसे भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है। रुबियो की इस यात्रा से रक्षा, व्यापार और तकनीकी मोर्चों पर भारत-अमेरिका सहयोग को एक नई रणनीतिक ऊंचाई मिलने की पूरी उम्मीद है।

 

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