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सड़क हादसे में गाड़ी का इंश्योरेंस न होने पर मुआवजा क्यों नहीं मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा तीखा सवाल

भारतीय न्याय व्यवस्था (Indian Judicial System) और सड़क सुरक्षा से जुड़ी इस वक्त एक बेहद अहम और बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने सड़क दुर्घटनाओं (Road Accidents) में पीड़ितों को मिलने वाली वित्तीय सहायता और मुआवजे को लेकर केंद्र सरकार से एक बहुत बड़ा और तार्किक सवाल पूछा है। केंद्र सरकार की तरफ से सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले परिवारों और घायलों को आर्थिक मदद देने के लिए एक विशेष मुआवजा योजना तैयार की गई है, लेकिन इस योजना में केवल उन वाहनों को शामिल किया गया है जिनके पास वैध बीमा (Insurance) मौजूद है। इस पर गहरी आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि जिन मामलों में दुर्घटना करने वाली गाड़ी का बीमा नहीं होता, उन पीड़ितों को इस सरकारी योजना के लाभ से क्यों वंचित रखा जा रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कुछ कहा है और सरकार के इस मुआवजे के नियमों के पीछे का पूरा गणित क्या है।

सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल: 'बिना बीमा वाले वाहनों के पीड़ितों को क्यों नहीं मिले मुआवजा'

सड़क हादसों के पीड़ितों और उनके परिवारों को तत्काल आर्थिक राहत प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार ने एक नई योजना का प्रस्ताव तैयार किया है। इस प्रस्तावित योजना के तहत सरकार सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के आश्रितों को 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल होने वाले व्यक्ति को 1 लाख रुपये की अंतरिम आर्थिक सहायता देने का प्रावधान कर रही है।

हालांकि, जब इस योजना के नियमों की समीक्षा सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने की गई, तो कोर्ट ने पाया कि इसमें केवल उन्हीं सड़क हादसों को शामिल किया गया है जिनमें बीमा युक्त (Insured) वाहन शामिल हों। इस बात पर कड़ा ऐतराज जताते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला (Justice J.B. Pardiwala) और जस्टिस केवी विश्वनाथन (Justice K.V. Viswanathan) की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि यदि किसी गरीब या आम नागरिक को टक्कर मारने वाला वाहन बिना बीमा (Uninsured Vehicle) का निकला, तो ऐसी स्थिति में पीड़ित परिवार को इस अंतरिम मुआवजे से क्यों महरूम रखा जाना चाहिए। कोर्ट की इस टिप्पणी ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

मोटर वाहन अधिनियम और सरकार का पक्ष: क्या कहते हैं नियम

सुप्रीम कोर्ट के इस तीखा सवाल का जवाब देते हुए सरकारी अधिकारियों और वकीलों ने अदालत को बताया कि इस मुआवजा योजना को मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act – MV Act) के उन प्रावधानों के तहत डिजाइन किया गया है जो मुख्य रूप से बीमा वाले वाहनों से जुड़े मामलों को कवर करते हैं। अधिकारियों का कहना था कि यदि दुर्घटना करने वाला वाहन बिना बीमा का है, तो पीड़ितों के पास कानूनी विकल्प के रूप में 'मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण' (MACT) का दरवाजा खटखटाने का रास्ता हमेशा खुला रहता है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस योजना की 'धारा 6' की बेहद बारीकी से समीक्षा की। इस धारा के नियमों के मुताबिक, दुर्घटना के शिकार व्यक्ति या मृतक के कानूनी उत्तराधिकारिगण एक निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से मुआवजे के लिए अपना आवेदन दर्ज करा सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उन्हें यह विवरण देना होता है कि उन्होंने MACT में कोई अन्य दावा दायर किया है या नहीं, या फिर उनका कोई मामला पहले से लंबित है या नहीं। कोर्ट ने सरकार को यह भी सख्त निर्देश दिए हैं कि इस योजना का देश भर में व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि आम जनता को अपने इन कानूनी अधिकारों और अंतरिम मुआवजे की मांग करने की प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी मिल सके।

'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' के तहत बीमा कंपनियों को देने होते हैं 5 लाख रुपये

सड़क दुर्घटनाओं में मिलने वाले मुआवजे के कानूनी प्रावधानों को समझाते हुए अधिकारियों ने अदालत को बताया कि मोटर वाहन अधिनियम की 'धारा 164' मौत या गंभीर चोट के मामलों में मुआवजे से सीधा संबंध रखती है। इस धारा के अंतर्गत 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' (No-Fault Liability यानी बिना किसी गलती के कानूनी दायित्व) का बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान तय किया गया है।

इस विशेष नियम के अनुसार, यदि किसी दुर्घटना में किसी की जान जाती है या कोई गंभीर रूप से घायल होता है, तो वाहन मालिक या उसकी बीमा कंपनी (Insurance Company) को मृत व्यक्ति के मामले में 5 लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में 2.5 लाख रुपये का मुआवजा अनिवार्य रूप से देना ही होता है। इसके तहत क्लेम करने वाले आवेदक को यह साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है कि दुर्घटना वाहन चालक की किसी विशेष गलती, लापरवाही या चूक के कारण हुई थी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर स्पष्ट करते हुए कहा, "यही कारण है कि तत्काल राहत के तौर पर मौत के मामले में 2 लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में 1 लाख रुपये की अंतरिम सहायता तय की गई है। बाद में MACT के अंतिम आदेश के आधार पर मिलने वाला कुल मुआवजा इससे कहीं अधिक भी हो सकता है।"

कब शुरू हुई थी इस योजना की प्रक्रिया और आगे क्या होगा

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारियों ने अदालत को यह भी जानकारी दी कि इस संपूर्ण मुआवजा योजना को 'केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम' (Central Motor Vehicles Act) के नियमों और प्रावधानों के तहत जल्द ही आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया जाएगा।

मंत्रालय ने इस योजना का ड्राफ्ट इसी साल 23 फरवरी को देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा कर दिया था ताकि इस पर राज्यों के सुझाव लिए जा सकें। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पिछले आदेश में अप्रैल 2025 में ही केंद्रीय मंत्रालय को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए यह अंतरिम मुआवजा योजना तैयार करने का सख्त निर्देश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट के इस नए सवाल के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार बिना बीमा वाले वाहनों के पीड़ितों को भी राहत के दायरे में लाने के लिए अपने नियमों में कुछ संशोधन कर सकती है। सड़क हादसों के शिकार होने वाले आम नागरिकों के लिए यह एक बहुत बड़ी राहत की खबर साबित हो सकती है।

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