काई बनेगी ‘ऑक्सीजन की फैक्ट्री’: झीलों और तालाबों के शैवाल से अब होगी हवा साफ

पर्यावरण प्रदूषण और जहरीली होती हवा से जूझ रहे देश के शहरी इलाकों के लिए विज्ञान और तकनीक की दुनिया से एक बेहद राहत भरी और क्रांतिकारी खबर सामने आ रही है। अब तक जिसे हम तालाबों और झीलों में केवल गंदगी या बेकार काई (Algae) समझकर नजरअंदाज करते थे, वही काई अब महानगरों की जहरीली हवा को साफ करने का सबसे बड़ा हथियार बनने जा रही है। पर्यावरण वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने मिलकर एक ऐसी अनूठी 'एल्गी तकनीक' विकसित की है, जिसके जरिए झीलों के प्राकृतिक शैवाल का उपयोग करके हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से सोखा जाएगा और भारी मात्रा में शुद्ध ऑक्सीजन छोड़ी जाएगी। देश भर के अलग-अलग शहरों में प्रदूषण के हॉटस्पॉट माने जाने वाले करीब 40 प्रमुख स्थानों पर इस तकनीक पर आधारित विशेष बायो-रिएक्टर और प्यूरीफायर लगाने की व्यापक तैयारी शुरू कर दी गई है। यह अनोखी पहल न सिर्फ शहरी प्रदूषण के संकट से निपटने में मददगार साबित होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर भी साबित होने जा रही है।
कैसे काम करती है यह अनूठी एल्गी तकनीक, झीलों की काई कैसे बन जाती है पर्यावरण की रक्षक
वैज्ञानिकों के अनुसार शैवाल (Algae) में प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करने की क्षमता सामान्य पेड़ों और पौधों की तुलना में कई गुना अधिक तेज होती है। यह तकनीक इसी प्राकृतिक खूबी का पूरा फायदा उठाती है, जिसमें शहरों की झीलों और जलाशयों से प्राकृतिक या कल्टीवेटेड एल्गी को निकालकर विशेष रूप से डिजाइन किए गए वर्टिकल बायो-रिएक्टर्स में भरा जाता है। जब इन सिलिंड्रिकल टावरों के जरिए प्रदूषित और जहरीली हवा को गुजारा जाता है, तो पानी में मौजूद ये सूक्ष्म पौधे हवा में घुले कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और अन्य हानिकारक कणों को अवशोषित कर लेते हैं और इसके बदले में प्रचुर मात्रा में शुद्ध ऑक्सीजन बाहर छोड़ते हैं। एक सामान्य पेड़ की तुलना में यह तकनीक छोटे से स्थान पर रखकर कई गुना अधिक तेजी से हवा को शुद्ध करने का माद्दा रखती है। इसके अलावा, इस प्रक्रिया के दौरान जो बायो-मास या अवशिष्ट बचता है, उसका उपयोग बायोफ्यूल, जैविक खाद और अन्य पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाने में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है, जिससे यह तकनीक पूरी तरह से सर्कुलर इकोनॉमी का एक बेहतरीन उदाहरण बन जाती है।
देश के 40 प्रमुख शहरों में इस प्रोजेक्ट के विस्तार की तैयारी, प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में बड़ा कदम
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और विभिन्न पर्यावरण संगठनों के सहयोग से शुरू किए जा रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत देश के उन 40 प्रमुख शहरों और चुनिंदा इलाकों को चुना गया है जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर खतरनाक स्तर पर बना रहता है। स्थानीय नगर निगमों और प्रशासनिक निकायों की मदद से झीलों के किनारे और भारी ट्रैफिक वाले चौराहों के पास इन एल्गी-आधारित प्यूरीफायर टावरों को स्थापित करने का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि यह तकनीक अपने शुरुआती परीक्षणों और परिणामों में पूरी तरह सफल रहती है, तो आने वाले समय में देश के अन्य महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकेगा। प्रकृति और आधुनिक विज्ञान के इस अद्भुत तालमेल से न केवल शहर की आबोहवा में सुधार होगा, बल्कि हमारी झीलें और जलस्रोत भी प्राकृतिक रूप से साफ और जीवंत बने रहेंगे, जिस पर अब देश भर के पर्यावरण प्रेमियों की निगाहें टिकी हुई हैं।