मनोज बाजपेयी ने खोली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कड़वी सच्चाई

हिंदी सिनेमा जगत में अपने संजीदा अभिनय और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता मनोज बाजपेयी ने फिल्म इंडस्ट्री के अंदरूनी माहौल पर अब तक का सबसे बड़ा और तीखा हमला बोला है। एक विशेष इंटरव्यू के दौरान बाजपेयी ने बॉलीवुड में व्याप्त भाईचारे के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे 'बकवास' और महज एक 'भ्रम' करार दिया है। तीन दशकों से अधिक समय से अभिनय की दुनिया में सक्रिय रहने वाले इस दिग्गज कलाकार ने कहा कि इस इंडस्ट्री में कोई किसी का सगा नहीं है और न ही कोई किसी की तरक्की या सफलता को देखकर दिल से खुश होता है। उनके इस विस्फोटक बयान ने बॉलीवुड के अंदरूनी ताने-बाने, कैंप कल्चर और कलाकारों के आपसी संबंधों पर एक बार फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फिल्म इंडस्ट्री एक परिवार है, यह सबसे बड़ा भ्रम और बकवास है: मनोज बाजपेयी
मनोज बाजपेयी ने बॉलीवुड के उस स्थापित नैरेटिव पर करारा प्रहार किया जिसमें अक्सर यह दावा किया जाता है कि 'हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक बड़ा परिवार है'। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्होंने कभी खुद को इस इंडस्ट्री का वास्तविक हिस्सा महसूस ही नहीं किया। बाजपेयी के शब्दों में, "इंडस्ट्री कोई परिवार या बिरादरी नहीं है; यह सबसे बड़ा भ्रम है। यहां हर किसी का अपना अलग दफ्तर है और सब केवल अपने व्यावसायिक हितों के लिए काम कर रहे हैं। कोई निर्देशक किसी दूसरे निर्देशक को खुद से बेहतर नहीं मानता और कोई भी प्रोडक्शन हाउस किसी दूसरे बैनर को ज्यादा मुनाफा कमाते हुए देखना पसंद नहीं करता। अगर किसी को किसी की फिल्म पसंद भी आ जाए, तो कोई फोन करके उसकी ईमानदारी से तारीफ करने की जहमत नहीं उठाता।"
वैनिटी वैन कल्चर और सोशल मीडिया ने खत्म कर दिया पुराना दोस्ताना माहौल
इंटरव्यू के दौरान पुरानी यादों को ताजा करते हुए मनोज बाजपेयी ने कहा कि पहले के दौर में शूटिंग के सेट पर कलाकारों के बीच एक सहज जुड़ाव और दोस्ताना बातचीत का माहौल हुआ करता था। शूटिंग के ब्रेक के दौरान या शाम को काम खत्म होने के बाद एक्टर्स एक साथ बैठते थे, सुख-दुख और अभिनय पर गपशप करते थे। लेकिन आज के आधुनिक युग में 'वैनिटी वैन कल्चर' और सोशल मीडिया ने इंसानी रिश्तों की जगह ले ली है। अब शूटिंग का शॉट खत्म होते ही हर कलाकार अपनी-अपनी वैनिटी वैन में जाकर बंद हो जाता है और मोबाइल फोन की आभासी दुनिया में खो जाता है। सेट पर समता और समान व्यवहार की कमी पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि हर स्तर पर सभी के लिए बराबरी का माहौल और बेहतर संवाद होना बेहद जरूरी है।
अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी, कोई मदद के लिए आगे नहीं आएगा
फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे नए कलाकारों और बाहरी (Outsiders) लोगों को यथार्थवादी सलाह देते हुए मनोज बाजपेयी ने कहा कि इस क्षेत्र में अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है। उन्होंने साफ किया कि यहां कोई भी आपकी मदद के लिए आगे नहीं आएगा और अगर कभी कोई मदद मिल जाती है, तो उसे केवल अपना एक अच्छा दिन मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "मैं सेट पर जाता हूं, अपना काम निष्ठा से करता हूं, अपने पैसे लेता हूं और बिना किसी अतिरिक्त लगाव के अपने घर लौट आता हूं। अगर लोग मेरी तारीफ कर रहे हैं या आलोचना कर रहे हैं, तो मैं दोनों से ही दूरी बनाकर रखता हूं।" बाजपेयी के मुताबिक, करियर में आने वाली विषमताओं और चुनौतियों का सामना करने के लिए अनुशासन और मानसिक मजबूती ही कलाकार का सबसे बड़ा हथियार होता है।