देश

EU संग ट्रेड डील पर प्रगति जारी, लेकिन CBAM पर भारत कतई नहीं झुकेगा

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement – FTA) को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन भारत ने अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों से किसी भी तरह का समझौता करने से साफ इनकार कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के आगामी जलवायु सम्मेलन कॉप-31 (COP31) से ठीक पहले केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने यूरोपीय संघ के विवादास्पद कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर भारत का रुख पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यूरोपीय संघ के साथ ट्रेड डील अपनी जगह है, लेकिन ग्रीन टैक्स यानी CBAM के आड़ में भारतीय निर्यातकों और उद्योगों पर थोपे जाने वाले एकतरफा टैरिफ को भारत किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। इस कड़े रुख से यह साफ हो गया है कि वैश्विक जलवायु मंच पर भारत विकासशील देशों की आवाज बनकर अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों की रक्षा मजबूती से करेगा।

क्या है यूरोपीय संघ का CBAM और भारत क्यों कर रहा है इसका सख्त विरोध

यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) एक तरह का कार्बन टैक्स है, जिसे यूरोपीय संघ अपने कार्बन-इंटेंसिव यानी अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले क्षेत्रों (जैसे स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक और बिजली) के आयात पर लागू कर रहा है। यूरोपीय संघ का तर्क है कि इस टैक्स का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और उनके घरेलू उद्योगों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा देना है। हालांकि, भारत का मानना है कि CBAM जैसे तंत्र पर्यावरण संरक्षण के नाम पर एक अप्रत्यक्ष व्यापारिक बाधा (Protective Trade Barrier) हैं, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों और संयुक्त राष्ट्र जलवायु ढांचे (UNFCCC) के पेरिस समझौते के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन करते हैं। पेरिस समझौता यह तय करता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी हर देश की अपनी क्षमताओं और ऐतिहासिक उत्सर्जन के आधार पर तय होनी चाहिए (Common But Differentiated Responsibilities – CBDR)।

COP31 से पहले भूपेंद्र यादव का दो टूक संदेश और भारत की रणनीति

आगामी COP31 जलवायु शिखर सम्मेलन से पहले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति और प्राथमिकताओं को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से पर्यावरण संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल रहा है, लेकिन किसी भी विकसित देश या संगठन को यह अधिकार नहीं है कि वह जलवायु नीति के बहाने विकासशील देशों के विकास दर और उद्योगों पर अनुचित कर प्रणाली थोपे। भूपेंद्र यादव के अनुसार, भारत COP31 के दौरान जलवायु वित्त (Climate Finance), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) और पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में मौजूद कमियों को दूर करने की मांग प्रमुखता से उठाएगा। भारत का कहना है कि विकसित देशों को खुद अपने वित्त पोषण और उत्सर्जन में कटौती के वादों को पूरा करना चाहिए, न कि विकासशील देशों के निर्यात पर अतिरिक्त टैक्स लादना चाहिए।

भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और व्यापारिक साख पर असर

भारत और यूरोपीय संघ के बीच कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं और दोनों पक्ष पारस्परिक रूप से लाभप्रद व्यापार समझौते पर पहुंचने की दिशा में प्रयासरत हैं। हालांकि, CBAM के लागू होने से भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्र, खासकर स्टील और एल्युमीनियम उद्योग, पर गहरा आर्थिक प्रभाव पड़ने की आशंका है। यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों पर यदि 20% से 35% तक का अतिरिक्त कार्बन टैक्स लगता है, तो इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता में भारी कमी आ सकती है। नई दिल्ली ने बार-बार यह रुख अपनाया है कि जलवायु चिंताओं को व्यापारिक वार्ता से अलग रखा जाना चाहिए और व्यापार समझौते (FTA) को केवल स्वच्छ और पारदर्शी आर्थिक मानदंडों के आधार पर ही अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। भारत का स्पष्ट मानना है कि ट्रेड डील और पर्यावरण नीतियां एक-दूसरे को बाधित करने का जरिया नहीं बननी चाहिए।

भारतीय उद्योगों की सुरक्षा और वैश्विक मंचों पर कानूनी विकल्प

CBAM के खिलाफ भारत केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर भी ठोस रणनीति बना रहा है। भारत सरकार ने पहले ही संकेत दिए हैं कि यदि यूरोपीय संघ CBAM पर अपने रुख में लचीलापन नहीं दिखाता या भारतीय निर्यातकों के लिए छूट का प्रावधान नहीं करता है, तो भारत इसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निवारण मंच (Dispute Settlement Mechanism) के सामने चुनौती दे सकता है। इसके साथ ही, भारत अपने घरेलू उद्योगों को अधिक ऊर्जा-कुशल और कार्बन-मुक्त बनाने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, राष्ट्रीय सौर मिशन और स्टील क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा दे रहा है, ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय एमएसएमई (MSME) और बड़े उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ न जाएं।

वैश्विक दक्षिण (Global South) की अगुवाई और भविष्य की दिशा

भूपेंद्र यादव का यह स्पष्ट संदेश न केवल भारत के व्यापारिक हितों की रक्षा करता है, बल्कि यह पूरे 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और गरीब देशों) की चिंताओं को भी एक मजबूत आवाज प्रदान करता है। विकसित देश वर्षों के औद्योगिक उत्सर्जन के बाद अब विकासशील देशों पर अनुचित टैक्स थोप रहे हैं, जो न्यायसंगत नहीं है। COP31 के मंच पर भारत जलवायु वित्त पोषण और अनुकूलन (Adaptation) की मांग को लेकर विकसित देशों को घेरेगा। नई दिल्ली का यह अडिग रुख यूरोपीय संघ को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है, क्योंकि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है और कोई भी वैश्विक व्यापार समझौता भारत की अनदेखी करके पूरा नहीं किया जा सकता।

Back to top button