रामायणम्’ के गानों पर भड़के ‘लक्ष्मण’ सुनील लहरी

रामायण के पौराणिक और ऐतिहासिक गाथा पर आधारित आने वाली नई सिनेमैटिक प्रस्तुतियों को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर फिल्मी गलियारों तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसी कड़ी में रामानंद सागर के दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले кульट सीरियल 'रामायण' में अमर लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले दिग्गज अभिनेता सुनील लहरी का एक तीखा और स्पष्ट बयान सामने आया है। सुनील लहरी ने हाल ही में रिलीज हुए 'रामायणम्' फिल्म के गानों और संगीत पर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि इस नए प्रोजेक्ट के गानों ने उनका मूड पूरी तरह से खराब कर दिया है। अभिनेता का साफ तौर पर कहना है कि वे चाहते हैं कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भारी व्यावसायिक सफलता हासिल करे, लेकिन इसमें प्राचीन त्रेता युग, पवित्र अयोध्या या मिथिला की सांस्कृतिक गरिमा और मौलिकता की कोई भी वास्तविक झलक दिखाई नहीं दे रही है, जो कि हमारे सनातन इतिहास के साथ एक बड़ा अन्याय है।
सुनील लहरी का तीखा बयान: आधुनिकता के नाम पर संस्कृति से हो रहा है खिलवाड़
एक प्रतिष्ठित मीडिया इंटरव्यू के दौरान जब अभिनेता सुनील लहरी से आने वाली भव्य फिल्म 'रामायणम्' के संगीत और उसके टीज़र-ट्रेलर में फिल्माए गए गानों के बारे में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी राय रखी। सुनील लहरी ने कहा कि जब उन्होंने फिल्म के हालिया गाने सुने, तो उन्हें बेहद निराशा हुई। उन्होंने तर्क दिया कि जब आप भगवान श्रीराम, माता सीता और रामायण जैसी महागाथा पर आधारित कोई भी फिल्म बनाते हैं, तो उसकी आत्मा उसकी मिट्टी, उसकी सभ्यता और प्राचीन भारत की संस्कृति में निहित होनी चाहिए। आज के दौर के आधुनिक संगीतकारों और फिल्म निर्माताओं द्वारा सिनेमैटिक लिबर्टी (Cinematic Liberty) के नाम पर जिस तरह की पश्चिमी धुनें और भड़कीले स्टाइल थोपे जा रहे हैं, वे हमारी पारंपरिक मान्यताओं और शास्त्रीय मर्यादाओं के बिल्कुल विपरीत हैं।
अयोध्या और मिथिला की माटी की खुशबू और पारंपरिक विशिष्टता गायब
सुनील लहरी ने अपने इस बयान में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया कि रामायण की परिकल्पना बिना अयोध्या के वैभव और मिथिला की शालीनता के पूरी ही नहीं हो सकती। भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या और माता सीता की नगरी मिथिला की अपनी एक अनूठी, पवित्र और शांत संस्कृति रही है, जहां की जीवनशैली, वेशभूषा और संगीत में सादगी और दिव्यता झलकती थी। अभिनेता का कहना है कि जब वे नए दौर की इस फिल्म के गाने सुनते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है कि यह किसी कॉर्पोरेट पार्टी या मॉडर्न क्लब का गाना है, न कि त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की गाथा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कला के आधुनिकीकरण के चक्कर में हमारी पौराणिक धरोहर की मूल आत्मा को ही नजरअंदाज कर दिया जा रहा है, जो दर्शकों को और विशेषकर नई पीढ़ी को भ्रामक संदेश दे सकती है।
फिल्म की व्यावसायिक सफलता की कामना, पर रचनात्मकता पर गंभीर सवाल
भले ही सुनील लहरी ने गानों और संगीत निर्देशन को लेकर कड़ी आलोचना की हो, लेकिन उन्होंने एक वरिष्ठ कलाकार की परिपक्वता दिखाते हुए यह भी कहा कि वे दिल से चाहते हैं कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी व्यावसायिक सफलता दर्ज करे और रिकॉर्ड तोड़ कमाई करे, क्योंकि इससे हमारे महाकाव्यों को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर एक नया विस्तार मिलेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सफलता इस बात का लाइसेंस नहीं बन जानी चाहिए कि आप किसी भी पौराणिक कथा को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दें। जब आप रामायण जैसे संवेदनशील विषय को पर्दे पर उतारते हैं, तो निर्माताओं पर नैतिक जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे जनता की आस्था और भावनाओं का पूरा सम्मान करें।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
सुनील लहरी के इस बयान के सामने आने के बाद से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एक नई और लंबी बहस छिड़ गई है। इंटरनेट यूजर्स का एक बड़ा वर्ग सुनील लहरी के इस तर्क से पूरी तरह सहमत नजर आ रहा है, जिनका मानना है कि आज की फिल्मों में पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव जरूरत से ज्यादा परोसा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, कुछ सिने प्रेमियों का यह भी तर्क है कि यह फिल्म आधुनिक तकनीकी और वीएफएक्स (VFX) के युग की है, इसलिए इसे आज के युवा दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर ही बनाया जा रहा है। बहरहाल, रामानंद सागर की 'रामायण' के लक्ष्मण द्वारा उठाए गए इन गंभीर सवालों ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को पर्दे पर लाते समय रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमाएं कहां तक होनी चाहिए।