सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: लेंडर होने के बावजूद CoC से क्यों बाहर हुई ECL Finance?

देश की शीर्ष अदालत ने कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी और रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े एक ऐतिहासिक मामले में एडेलवाइस ग्रुप की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) ECL Finance Ltd. और उसके डिबेंचर ट्रस्टी IDBI Trusteeship Services Ltd. को करारा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसले पर मुहर लगाते हुए दोनों वित्तीय संस्थानों को पाम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (Palm Developers) की क्रेडिटर्स कमेटी (CoC – Committee of Creditors) में शामिल होने और वोटिंग अधिकार इस्तेमाल करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही कोई संस्थान तकनीकी रूप से केवल कर्जदाता (Financial Creditor) दिखाई देता हो, लेकिन यदि अनुबंधों और शर्तों के जरिए उसका कंपनी के फैसलों, फंड्स के प्रवाह और आंतरिक प्रबंधन पर गहरा दखल रहा हो, तो वह इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत सीधे तौर पर ‘रिलेटेड पार्टी’ (Related Party) के दायरे में आएगा।
कर्ज, गारंटी और दिवालिया प्रक्रिया: क्या है पूरे विवाद की जड़?
इस पूरे कानूनी संग्राम की शुरुआत मुख्य कर्जदार कंपनी साहा इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (SIPL) को दिए गए भारी-भरकम कर्ज से हुई थी। ECL Finance ने SIPL को ₹160 करोड़ के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCDs) और ₹90 करोड़ की टर्म लोन सुविधा मुहैया कराई थी, जिसमें एकमात्र डिबेंचर होल्डर ECL खुद थी और IDBI Trusteeship को डिबेंचर ट्रस्टी बनाया गया था। इस विशाल कर्ज के लिए रियल एस्टेट कंपनी पाम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (कॉरपोरेट देनदार/बिल्डर) को कॉर्पोरेट गारंटर बनाया गया। जब SIPL और गारंटर समय पर भुगतान करने में नाकाम रहे, तो पाम डेवलपर्स के खिलाफ कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हो गया। इसके बाद ECL Finance ने लगभग ₹139 करोड़ और IDBI Trusteeship ने लगभग ₹131 करोड़ के भारी दावों के साथ बतौर फाइनेंशियल क्रेडिटर CoC में प्रवेश कर लिया। इतने बड़े दावे के चलते क्रेडिटर्स कमेटी के कुल वोटिंग शेयर पर इन्हीं का एकतरफा दबदबा कायम हो गया, जिससे प्रोजेक्ट के वास्तविक हितधारकों यानी घर खरीदारों की आवाज पूरी तरह दबने लगी।
होमबायर्स की कानूनी लड़ाई और लेंडर के 'अति-नियंत्रण' का पर्दाफाश
पाम डेवलपर्स के अटके हुए आवासीय प्रोजेक्ट में जीवनभर की जमा-पूंजी लगाने वाले एक घर खरीदार (होमबायर) ने NCLT में इस भागीदारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। होमबायर की याचिका में ठोस दस्तावेज पेश करते हुए आरोप लगाया गया कि ECL Finance महज एक बाहरी लेंडर नहीं थी, बल्कि लोन एग्रीमेंट्स और डिबेंचर ट्रस्ट डीड की बेहद सख्त शर्तों के जरिए बिल्डर के प्रोजेक्ट, बजट आवंटन, फ्लैटों की बिक्री की दरों, एस्क्रो अकाउंट से फंड्स की निकासी और वित्तीय डायवर्जन पर उसका चौतरफा नियंत्रण था। जब मामला सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष पहुंचा, तो अदालत ने अनुबंधों की गहन पड़ताल की। अदालत ने पाया कि लेंडर के पास कंपनी के बोर्ड स्तर के गतिरोध (Deadlock) सुलझाने, प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारियों (KMP) की नियुक्ति पर वीटो लगाने और दैनिक कारोबारी व नीतिगत फैसलों को तय करने के असाधारण अधिकार मौजूद थे, जो सामान्य लेंडर प्रोटेक्शन क्लॉज से कहीं आगे बढ़कर कंपनी को सीधे चलाने (Pervasive Control) जैसे थे।
'ड्राइविंग सीट' जरूरी नहीं, 'नेविगेटर' की भूमिका भी बनेगी रिलेटेड पार्टी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कानून की एक बेहद अहम व्याख्या तय की। पीठ ने स्पष्ट किया कि IBC की धारा 5(24)(m)(i) के तहत किसी इकाई को रिलेटेड पार्टी साबित करने के लिए उसका कंपनी की 'ड्राइविंग सीट' यानी प्रत्यक्ष बोर्ड मेंबर या शेयरधारक होना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई ऋणदाता पर्दे के पीछे से कंपनी की दिशा, नीति निर्माण (Policy-Making Process) और नकदी के आवागमन को नियंत्रित करने वाले 'नेविगेटर' की भूमिका निभा रहा है, तो वह निष्पक्ष कर्जदाता नहीं रह जाता। IBC की धारा 21(2) के अनुसार कोई भी रिलेटेड पार्टी क्रेडिटर्स कमेटी की बैठक में वोट नहीं कर सकती, ताकि दिवालिया प्रक्रिया की शुचिता बनी रहे। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होने के बाद कानूनी शिकंजे से बचने के लिए कर्ज के अधिकारों को किसी तीसरे पक्ष को ट्रांसफर (Assignment) करने की चाल को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता, बल्कि यह पिछले दरवाजे से CoC पर कब्जा बनाए रखने का प्रयास था जिसे पूरी तरह खारिज किया जाता है।
घर खरीदारों को मिली नई ताकत और वित्तीय जगत के लिए बड़ा सबक
इस फैसले से पाम डेवलपर्स के सैकड़ों होमबायर्स को बहुत बड़ी राहत मिली है। CoC से ECL Finance और ट्रस्टी के लगभग 270 करोड़ रुपये के दावों की वोटिंग पावर हटने से घर खरीदारों का वोटिंग प्रतिशत बहुमत में आ गया है, जिससे अब प्रोजेक्ट को किसी सक्षम बिल्डर को सौंपकर फ्लैट्स का निर्माण पूरा कराने का रास्ता साफ हो सकेगा। इसके साथ ही यह निर्णय देश के तमाम बैंकों, एनबीएफसी और प्राइवेट क्रेडिट फंड्स के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया है। अब कर्ज देते समय लेंडर्स कंपनियों पर ऐसे आक्रामक और आंतरिक नियंत्रण वाले क्लॉज नहीं थोप सकेंगे जो उन्हें कंपनी का छाया-प्रबंधक (Shadow Director) बना दें, क्योंकि कंपनी के संकट में फंसते ही ऐसे कर्जदाताओं को अपनी वोटिंग सीट गंवानी पड़ जाएगी।