शशि थरूर को भारत के सामने दिख रहा ऐतिहासिक अवसर

अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए 2026 के मध्यावधि चुनावों (US Midterm Elections) में डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सेनेट दोनों में हासिल की गई बड़ी जीत के बाद वैश्विक राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। इस बड़े सियासी उलटफेर पर कांग्रेस सांसद और विदेश मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष डॉ. शशि थरूर ने अपना विस्तृत विश्लेषण साझा किया है। थरूर का मानना है कि अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण स्थापित होने से भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया और अनूठा संतुलन देखने को मिलेगा। इस बदलाव के बावजूद भारत के पास अपनी बहुपक्षीय कूटनीति और व्यापारिक वार्ताओं को और मजबूत करने का एक बेहतरीन ऐतिहासिक अवसर है। अमेरिकी नीति-निर्माण के तंत्र में आ रहे इस बदलाव के बीच भारतीय विदेश नीति के लिए आगे के रास्ते पूरी तरह से साफ नजर आ रहे हैं।
डेमोक्रेट्स की जीत और ट्रंप प्रशासन पर बढ़ता संसदीय दबाव
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स के कब्जे के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए विधायी मोर्चे पर रास्ते कठिन होने जा रहे हैं। शशि थरूर ने अपने विश्लेषण में रेखांकित किया है कि वाशिंगटन में सत्ता के इस विभाजन के बाद अमेरिकी विदेश नीति और रक्षा मामलों से जुड़ी समितियों की कमान अब डेमोक्रेटिक सांसदों के हाथों में आ जाएगी। इससे ट्रंप प्रशासन के सैन्य और आर्थिक फैसलों पर तीखी संसदीय निगरानी (Congressional Oversight) बढ़ेगी। हालांकि, थरूर ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिकी संविधान के तहत राष्ट्रपति के पास विदेश नीति, व्यापारिक टैरिफ और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लेकर व्यापक शक्तियां बनी रहती हैं। इसलिए केवल सरकार बदलने या संसद पर विपक्ष का नियंत्रण होने से रातों-रात ट्रंप प्रशासन का रणनीतिक रुख पूरी तरह से नहीं बदल जाएगा।
भारत के सामने ऐतिहासिक अवसर और कूटनीतिक रणनीतियां
शशि थरूर के अनुसार, यह नया राजनीतिक परिदृश्य नई दिल्ली के लिए एक बड़ा मौका पेश करता है। वाशिंगटन में संतुलित कूटनीति साधने के लिए भारत को अब केवल व्हाइट हाउस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि वह अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) में मौजूद अपने मित्रवत सांसदों का इस्तेमाल भारत-हितैषी नीतियों को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है। भारत-अमेरिका रक्षा और तकनीकी सहयोग (iCET) जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं दोनों देशों की दीर्घकालिक आवश्यकताओं का हिस्सा हैं, जिन पर दोनों दलों की सहमति रहती है। हालांकि, व्यापारिक टैरिफ, रूस से तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ मजबूती और सतर्कता से सौदेबाजी (Negotiations) जारी रखनी होगी।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय और वीजा नीति पर पड़ने वाला प्रभाव
अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजों का एक सकारात्मक पहलू वहां रह रहे भारतीय समुदाय पर पड़ सकता है। थरूर का कहना है कि संसद में डेमोक्रेट्स का दबदबा रहने से ट्रंप सरकार के सख्त आव्रजन (Immigration) और वीजा नियमों के आक्रामक रूप पर कुछ अंकुश लगेगा। प्रवासियों के प्रति अधिक सकारात्मक रुख रखने वाले सांसदों की वजह से भारतीय पेशेवरों और छात्रों को एच-1बी (H-1B) वीजा, ग्रीन कार्ड बैकलॉग और कानूनी प्रक्रियाओं में राहत मिलने की संभावना बढ़ गई है। भारत को किसी एक राजनीतिक दल से जुड़ने के बजाय 'द्विपक्षीय आम सहमति' (Bipartisan Support) को साधते हुए अपनी वैश्विक स्थिति को और मजबूत बनाना होगा।